कालः। अद्य शुक्रवार
क्रोधी चैत्र कृष्ण सप्तमी। शकान्त १९४६ गत पूर्णिमान्त ०१ कृष्ण ०७ । चन्द्र ज्येष्ठा। सूर्य मीन वसन्त उत्तरायण देवयान। बृहस्पति वृषभ।
राज
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शास्त्र तन्त्र भाषा इतिहास।
अरुष। गमनशीले अश्वादौ वेदे। अक्रोधी। चक्कर काटनेवाला जैसे घोडा।

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"The translation of modern European scientific terminology into Chinese was carried out methodologically a century ago as part of the New Culture Movement. It went hand in hand with the development of the modern Chinese language itself. There weren’t direct equivalences for subjects like “physics” and “chemistry” or terms like “particle” or “quantum” in classical Chinese; everything needed to be defined, explained, and named. The Chinese intellectuals who learned and spread the knowledge of Western science via translation essentially reinvented the Chinese language. As a result, almost every science term that I have ever had to translate into English already has a specific corresponding word at hand. I only need to translate back what had already been translated into Chinese a century ago."


#SixthTone
The ‘Santi’ Aren’t Real
Netflix’s “3 Body Problem” translated Liu Cixin’s epic to the small screen — with one notable exception.
आर्याक्रमणवाद। शास्त्र प्रमाण है कि भारतीय वैदिक सभ्यता का उद्गम सरस्वती दृषद्वती नदियों के बीच ब्रह्मावर्त नामक भूभाग में हुआ। भौतिक प्रमाण है कि सरस्वती नदी लगभग चार सहस्र वर्ष पूर्व लुप्त हुई। एैतिहासिक प्रमाण है कि बाहरी क्षेत्रों से शक हूण तुरुष्क आदि आगन्तुक थे परन्तु भाषा पर बहुत प्रभावी नहीं। सम्भावना है कि भारतमूल प्रवासी वणिक अथवा जनजातियों का इन बाहरी क्षेत्रों पर भाषागत शैक्षणिक प्रभाव बहुत पहले से था।
https://www.nature.com/articles/s41586-024-08531-5
खण्डत्ववाद में तरंग समीकरण। यीखत्राम्शावका तु व्यखव हृद्विमा घ्नत्रद्व्यम्शावया सस्थत्र॥ यी ऋणएकमूल। ख खण्डत्व अविकारी अस्रीयद्रव्यगति प्रकार। त्र तरंगकलन देशकाल निर्भर। का काल विकारी। या अक्षीय स्थान विकारी। अम्शाव आम्शिक अवकलन। खव ख वर्ग। मा द्रव्यमान। स्थ स्थितिज ऊर्जाकलन देशकाल निर्भर।
वस्तुतः भाषा में स व्य इत्यादि उपसर्ग जोडने की शैली सामान्य है। जैसे कि दो तु एक सएक। यह भी संश्रृंखल कलन लेखन है तथा बिना कोष्ठक के भी स्पष्ट अर्थ। इस लेखन विधि में चतुर्थ समीकरण। चुपरि तु व्यम्शावका घ्नविशील सविघन घ्नचुशील।
विद्युत्चुम्बकीय समीकरण। विब तु विघन विशील हृ। विपरि तु च्वम्शावका व्य। चुब तु शून्य। चुपरि तु व्यम्शावका विशील घ्न विघन स चुशील घ्न॥ विस्तृततः। विद्युत्क्षेत्रस्य बहिर्वाहघनत्व तु विद्युत्भारघनत्व विद्युत्शीलता हृ। विद्युत्क्षेत्रस्य परिचलनघनत्व तु चुम्बकक्षेत्राम्शावका व्य। चुम्बकक्षेत्रस्य बहिर्वाहघनत्व तु शून्य। चुम्बकक्षेत्रस्य परिचलनघनत्व तु विद्युतक्षेत्राम्शावका विद्युत्शीलता घ्न विद्युत्भारघनत्व स चुम्बकशीलता घ्न॥ अम्शावका अर्थात काल सापेक्ष आम्शिक अवकलन। लेखन विधि बिना कोष्ठक संश्रृंखल क्रमलेख भाषावत जैसे कि दो तु एक एक स।


इस सामान्य तर्क से विश्वामित्र का वृत्तान्त अखण्डित रह जाता है। मतंग के परिस्थिति विशेष के लिए विधि प्रभेद की अनुपलब्धि के कारण उसका वृत्तान्त भी यथावत प्रामाणिक। तो इस विषय पर शास्त्र के इन अम्शों में कोई बडी विसंगति विदित नहीं।
लक्षण भेद से वस्तु भेद॥ स्पष्ट शास्त्र वचन है कि अमुक सिद्धि दुर्लभम् दुष्प्राप्यम्। अतः प्राप्त करने की विधि दुष्कर दुःसाध्य। शास्त्र में अमुक मन्त्र विधि स्वयम करें तो दुष्कर। पर उस श्रम को काटकर बाँटकर विधि को सुकर सुसाध्य बनाने से विधि के लक्षण मे स्पष्ट भेद हो जाएगा। लक्षण भेद से विधि भेद। अर्थात अब नहीं कह सकते यह वही विधि है। वही विधि नहीं तो वह अभीष्ट फल भी प्राप्य नहीं।
प्रष्टव्य। विश्वामित्र राजा था धनी था। वह भी कुछ पचास सहस्र लोग एकत्रित करके अपने व्यक्तिगत उत्थान के लिए उनसे अमुक मन्त्र का जप करवा सकता था। आधे घण्टे में कार्य सम्पन्न हो जाता। पर नहीं किया। तो कुछ तो बाधक विधि निषेध होना चाहिए। जिसका कर्म उसका फल सामान्य नियम है। फल का भोग कोई अन्य कर सके इसका क्या नियम।
शिवपुराण विद्येश्वरसम्हिता प्रणवमाहात्म्य। मंत्रसिद्धिर्जपाच्चैवक्रमान्मुक्तोभवेन्नरः।१२५। विवादजनक।
व्रात्यत्व। वैदिक कर्म अधिकार के लिए अमुक संस्कार विशेष विधिवत तथा समय पर नहीं हुआ तो व्रात्य उपाधि लग जाती है। कर्मों में अनधिकृत माने जाते हैं। विशेषतः वैदिक संन्यासाश्रम इत्यादि में भी। इसके परिहारार्थ शास्त्रों में विधि उपलब्ध हैं। कठिन हो सकते हैं पर अवश्य सम्भाव्य।
मतंग। स्व व्याख्यान। महाभारत अनुशासनपर्व तथा स्कन्दपुराण आवन्त्यखण्ड लिंगमाहात्म्य में मतंग का वृत्तान्त उपलब्ध है। इतिहास पुराण उभय सम्मत कथन है कि घोर तपस्या पश्चात इन्द्रदेव द्वारा मतंग को ऊर्ध्वगति प्राप्त तो हुई पर देहत्याग भी हुआ। इस प्रकार भीष्म तथा इन्द्रदेव दोनों के दुर्लभमिति दुष्प्राप्यमिति कथनों का सत्यापन हुआ तथा मतंग का उत्थान भी हुआ। पुराण में अधिक विवरण है कि अमुक लिंग विशेष के अनुग्रह से यह साध्य था। यांतित्रिविष्टपम् वासोऽक्षयोदिवि इत्यादि वचनों से स्पष्ट किया गया की इस लिंग के दर्शन ध्यान पूजा से अन्य लोगों को भी स्वर्गगति अथवा शाश्वत दिवंगत अवस्था प्राप्त होगी। अर्थात यह दैहिक मृत्यु का वरदान है।
व्यासस्मृतिः। श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते। तत्र श्रौतं प्रमाणं तु तयोर्द्वैधे स्मृतिर्वरा ॥४॥ स्मृति पुराण में विरोध हो तो स्मृति प्रामाणिक। इतिहासों को पुराण कोटि में माना जा सकता है।
स्मर्त्तव्य॥ विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥ अर्थात स्वतन्त्रता है पर शास्त्रबोध का भी महत्व है।
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प्रवृत्ति मार्ग में भी एैसी निवृत्ति साध्य।
कालः। अद्य रविवारः १९४६१००७कृ॰ । चन्द्रः उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र। सूर्यः धनु राशि शिशिर ऋतु उत्तरायण पितृयाण। बृहस्पतिः वृषभ राशि।
टिबेट सागर पुष्प। दीर्घजीवियों की एक वंश की रहस्यमय तथा रोमांचक कहानी। बहुत से ऐसे पुरातत्व से जुडे कहानियाँ आजकल प्रचलित हैं चीनिस्तान में। चित्रण तथा कला में उच्च गुणवत्ता पर ध्यान प्रत्यक्ष है। शीतकाल में बौद्ध श्रमणालय के दृष्य बहुत आकर्षक। परन्तु इन कहानियों में अन्त में सभी बातों का पूर्णतः भौतिकवादी व्याख्यान कर देते हैं। जैसे पाश्चात्य में स्टारवार्स के जेडै योद्धाओं के अलौकिक शक्तियों का कारण मिडिक्लोरियन जीवाणु बता दिया। इनके आधुनिकता में आध्यात्मिकता के लिए कोइ अवकाश नहीं।
आर्खिमिडीस गतिजनक। आज से लगभग चालीस सहस्र वर्ष पश्चात की एक वैज्ञानिक काल्पनिक प्रपंच। मनुष्य पृथ्वी से पलायन होकर सेण्टौरी तारासमूह के अनेक ग्रहों में बसे हुए हैं। वहाँ के राज्यों में संघर्ष विकसित अविकसित मनुष्य जातियों में सम्बन्ध गुप्तचरों के रहस्य अभियान तथा प्रतिस्पर्द्धा की रोचक कहानी। थोडा जागरूकतावादी पर लेखक के पूर्व कृत्यों को चाहनेवालों के लिए अवश्य अनुशंसित।
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