चीन आबादी बढ़ाने के लिए ले रहा आईवीएफ का सहारा:इनफर्टिलिटी 18 प्रतिशत, इससे IVF कराने वालों की संख्या बढ़कर 11 लाख हुई
चीनी जोड़े पुरानी पीढ़ियों के मुकाबले अधिक उम्र में शादी कर रहे हैं। यह इनफर्टिलिटी की समस्या अधिक बढ़ने का एक कारण है। संतान पैदा कर सकने वाले जोड़ों में इनफर्टिलिटी 2020 में 18% पाई गई जबकि 2007 में यह 12% थी। इससे आईवीएफ की मांग बढ़ी है। चीन में लैब की मदद से संतान को जन्म देने का इलाज कराने वालों की संख्या 2013 के 2.36 लाख के मुकाबले 2019 में 11 लाख हो गई थी। आज चीन में 600 लाइसेंसी क्लिनिक हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार आईवीएफ से 2022 में करीब तीन लाख बच्चों के जन्म हुए थे। अधिक बच्चों के लिए बेचैन देश में इस छोटी संख्या ने भी सरकार का ध्यान खींचा है। चीनी सरकार ने जन्मदर बढ़ाने के लिए अच्छा पैकेज देना शुरू किया है। 2025 में तीन साल से कम आयु के प्रति बच्चे के लिए हर साल 47689 रुपए भत्ता देने की योजना शुरू की है। जनवरी में कंडोम पर वैट की दर 13% कर दी गई। 2022 में केंद्र सरकार ने फर्टिलिटी ट्रीटमेंट को सार्वजनिक बीमा योजनाओं में शामिल किया है। 2024 में दस लाख से अधिक लोगों को आईवीएफ ट्रीटमेंट कराने के खर्च की भरपाई की गई। 2025 के मध्य में सभी 31 प्रांतीय सरकारों ने इसे अपनी योजनाओं में शामिल कर लिया है। आईवीएफ के एक चक्र पर 20 से 50 हजार युआन तक खर्च आता है। कई शहर दस हजार युआन तक दे रहे हैं। फिर भी, जनसंख्या विशेषज्ञों को संदेह है कि आईवीएफ सब्सिडी सेजन्मदर में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।जापान और दक्षिण कोरिया दशकों सेआईवीएफ सहित जन्म दर बढ़ाने सेजुड़ी नीतियों पर भारी खर्च कर रहे हैं। दोनों की आबादी कोई खास नहीं बढ़ी है। चीन में संतान पैदा करने की दर बहुत अधिक बढ़ाने के लिए सहायक कार्यक्रमों को कई गुना बढ़ाना पड़ेगा। यह इतना आसान नहीं है। अस्पतालों में ऐसे अधिक मरीज आ रहे हैं जिनकी आयु 35-40 के बीच है। इस आयु में सफलता की दर कम होती है। हॉन्गकॉन्ग साइंस टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी के स्टुअर्टगीतेल बास्टेन कहते हैं, आईवीएफ इनफर्टिलिटी में मदद करता है, संतान के बारे में दुविधा या अस्पष्टता में नहीं। इस तरह बहुत कम लोगों को फायदा होता है। चीन में यह सीमित पूल पहुंच की समस्या और सरकार की नीतियों से और सिकुड़ गया है। क्लीनिक्स की संख्या संपन्न शहरों में ज्यादा है। 2023 से 2025 तक दो करोड़ 22 लाख आबादी के बीजिंग में 53 हजार लोगों ने सरकारी इंश्योरेंस से फर्टिलिटी ट्रीटमेंट कराया था। इसकी तुलना में इतनी ही आबादी के उत्तर पूर्वी प्रांत जिलिन में छह हजार से कम महिलाओं को ही 2024 में योजना शुरू होने के पहले वर्ष में फायदा हुआ था। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के करेन एगलस्टोन कहते हैं, ये असमानताएं चीन के हेल्थ सिस्टम के ढांचे की झलक दिखाती हैं। प्रांतों को अपने इंश्योरेंस खर्च का बड़ा हिस्सा उठाना पड़ता है। इसलिए संपन्न इलाके ज्यादा खर्च करते हैं। गरीब इलाकों में लोगों की इलाज कराने की क्षमता नहीं है। मिसाल के तौर पर निंगशिया की प्रति व्यक्ति सालाना आय ट्रीटमेंट के एक साइकल से कम है। इसके अलावा आईवीएफ के लिए कड़े राष्ट्रीय और प्रांतीय नियम हैं। केवल विवाहित जोड़ों का इलाज हो सकता है। कई स्थानों में मां की आयु का ध्यान रखा जाता है। एग फ्रीज करने के नियम बहुत सख्त हैं। फर्टिलिटी दर बहुत कम चीन उन देशों में है जिनमें फर्टिलिटी (प्रजनन क्षमता) की दर दुनिया में सबसे कम है। औसत चीनी महिला का अपने जीवनकाल में केवल एक बच्चा होता है। यह 2017 के 1.8 और आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी 2.1 से बहुत कम है।
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इजराइल ने ट्रैफिक कैमरे हैक कर खामेनेई पर हमला किया:सालों तक नजर रखी, ऑफिस पर 30 मिसाइलें गिराई, 40 अफसर भी मारे गए
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की शनिवार को इजराइल के हवाई हमले में मौत हो गई। यह हमला तेहरान की पास्चर स्ट्रीट के पास उनके ऑफिस पर हुआ, जहां वे कई बड़े ईरानी नेताओं के साथ बैठक कर रहे थे। इस हमले में इजराइल ने ऑफिस पर 30 मिसाइलें गिराई थीं, जिसमें खामेनेई के साथ 40 अफसर भी मारे गए थे। इजराइल ने कई सालों से इस हमले की तैयारी की थी। उनकी खुफिया एजेंसी मोसाद और यूनिट 8200 ने तेहरान के लगभग सभी ट्रैफिक कैमरों को हैक कर लिया था। इन कैमरों की तस्वीरें एन्क्रिप्ट करके तेल अवीव और दक्षिण इजराइल के सर्वरों पर भेजी जाती थीं। अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA ने भी इस ऑपरेशन में मदद की। इसमें एक खास कैमरा था, क्योंकि उससे पता चलता था कि सीनियर अधिकारियों के बॉडीगार्ड और ड्राइवर अपनी निजी गाड़ियां कहां पार्क करते हैं। इजराइल ने ईरान की फोन टावरों को हैक किया था इन कैमरों से इजराइल को अफसरों के बारे में बहुत जानकारी मिली, जैसे उनका घर कहां है, वे कब ड्यूटी पर आते हैं, कौन सा रास्ता लेते हैं, और सबसे जरूरी बात वे किस नेता की सुरक्षा करते हैं या किसे ले जाते हैं। इसे इंटेलिजेंस में 'पैटर्न ऑफ लाइफ' कहते हैं।
यह जानकारी इजराइल को खामेनेई की हत्या के लिए बहुत काम आई। यह एकमात्र तरीका नहीं था। इजराइल और CIA ने कई तरह की खुफिया जानकारी जुटाई थी। इजराइल ने पास्चर स्ट्रीट के आसपास के मोबाइल फोन टावरों को भी हैक किया, ताकि हमले के समय फोन व्यस्त दिखें और सुरक्षा टीम को कोई चेतावनी न मिले।
ईरान के कोने-कोने से वाकिफ है इजराइली अधिकारी इजराइल के एक इंटेलिजेंस अधिकारी ने कहा कि वे तेहरान को उतनी अच्छी तरह जानते हैं जितनी अच्छी तरह यरुशलम को जानते हैं। जब आप किसी जगह को इतनी अच्छी तरह जानते हैं, तो वहां की कोई भी छोटी सी गड़बड़ी भी नजर आ जाती है। यह सब इजराइल की यूनिट 8200 (सिग्नल इंटेलिजेंस), मोसाद के ह्मयुमन सोर्स और मिलिट्री इंटेलिजेंस के डेटा से हुआ। उन्होंने सोशल नेटवर्क एनालिसिस नाम की मैथमैटिकल विधि से अरबों डेटा पॉइंट्स को छांटा और नए टारगेट ढूंढे। इजराइल में टारगेटिंग इंटेलिजेंस बहुत जरूरी है, अगर फैसला होता है कि किसी को मारना है, तो इंटेलिजेंस उसे पूरा करने के लिए तैयार हो जाता है। खामेनेई बोले थे- मेरी मौत से फर्क नहीं पड़ता खामेनेई की हत्या एक राजनीतिक फैसला था, सिर्फ तकनीक का कमाल नहीं। जब CIA और इजराइल को पता चला कि शनिवार सुबह खामेनेई अपने ऑफिस में बैठक कर रहे हैं और कई बड़े नेता साथ हैं, तो मौका बहुत अच्छा लगा। युद्ध शुरू होने के बाद उन्हें ढूंढना मुश्किल हो जाता, क्योंकि वे बंकरों में छिप जाते। खामेनेई हिज्बुल्लाह के नेता हसन नसरल्लाह की तरह छिपकर नहीं रहते थे। नसरल्लाह सालों से बंकर में रहता था, लेकिन खामेनेई ने कभी-कभी सार्वजनिक रूप से कहा था कि उनकी मौत से फर्क नहीं पड़ता। 37 साल से ईरान की सर्वोच्च सत्ता पर काबिज थे खामेनेई आयतुल्ला अली खामेनेई 1989 में रुहोल्लाह खुमैनी के निधन के बाद से ईरान के सर्वोच्च नेता के पद पर काबिज थे। ईरान में 1979 की इस्लामी क्रांति के दौरान, जब शाह मोहम्मद रजा पहलवी को हटाया गया तो खामेनेई ने क्रांति में बड़ी भूमिका निभाई थी। इस्लामिक क्रांति के बाद खामेनेई को 1981 में राष्ट्रपति बनाया गया। वह 8 साल तक इस पद पर रहे। 1989 में ईरान के सुप्रीम लीडर खुमैनी की मौत के बाद उन्हें उत्तराधिकारी बनाया गया था। अब मारे गए सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के बारे में जानिए… अयातुल्ला अली खामेनेई रेजा शाह पहलवी की नीतियों के खिलाफ थे और इस्लामी शासन की वकालत करते थे। 1963 में शाह के खिलाफ भाषण देने पर उन्हें गिरफ्तार भी किया गया। धीरे-धीरे वे सरकार विरोधी आंदोलन का बड़ा चेहरा बन गए और खोमैनी के भरोसेमंद सहयोगी माने जाने लगे। 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई और शाह की सरकार गिर गई। खोमैनी देश लौटे और नई इस्लामिक सरकार बनाई। खामेनेई को क्रांतिकारी परिषद में जगह मिली और बाद में उप रक्षामंत्री बनाया गया। 1981 में तेहरान की एक मस्जिद में भाषण के दौरान खामेनेई पर बम हमला हुआ। उसी साल एक और बम धमाके में तत्कालीन राष्ट्रपति की मौत हो गई। इसके बाद हुए चुनाव में खामेनेई भारी बहुमत से जीतकर ईरान के तीसरे राष्ट्रपति बने। 1989 में खोमैनी के निधन के बाद खामेनेई को देश का सर्वोच्च नेता यानी ‘रहबर’ बनाया गया। इसके लिए संविधान में बदलाव भी किया गया। समर्थक उन्हें इस्लामी व्यवस्था का मजबूत रक्षक मानते हैं, जबकि आलोचक उन पर सख्त और कट्टर शासन चलाने का आरोप लगाते हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की पत्नी की भी मौत ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के 2 दिन बाद उनकी पत्नी मंसूरेह खोझस्तेह बघेरजादेह का भी निधन हो गया है। मंसूरेह दो दिन पहले अमेरिका और इजराइल के हमले में घायल हुई थीं। इसी हमले में खामेनेई मारे गए थे। ईरान की सरकारी मीडिया ने पुष्टि की है कि मंसूरेह ने सोमवार को इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। मंसूरेह ने 1964 में अयातुल्ला अली खामेनेई से शादी की थी। उस वक्त खामेनेई एक युवा धर्मगुरु के रूप में सक्रिय थे। 1947 में मशहद में जन्मीं मंसूरेह एक धार्मिक परिवार से आती हैं। उनके पिता आयतुल्लाह मोहम्मद बघेर खोझस्तेह मशहद के प्रतिष्ठित धर्मगुरु थे। पिछले साल ईरान के कई न्यूक्लियर वैज्ञानिक मारे गए थे जून 2025 के 12 दिनों के युद्ध में इजराइल ने ईरान के कई न्यूक्लियर वैज्ञानिकों और बड़े अधिकारियों को मारा था। उस समय ईरान के एयर डिफेंस को साइबर अटैक, छोटे ड्रोन और सटीक मिसाइलों से नष्ट किया गया था। इजराइल ने स्पैरो मिसाइल इस्तेमाल की, जो 1000 किलोमीटर से ज्यादा दूर से छोटे टारगेट को मार सकती है।
इस हमले में इजराइल के जेट कई घंटे उड़कर आए और 30 से ज्यादा सटीक मिसाइलें दागीं। हमला सुबह किया गया था, यह ईरान के लिए सरप्राइज मिलने जैसा था। इजराइल को दो खुफिया एजेंटों ने खामेनेई के ऑफिस में होने की पुष्टि की थी। इजराइल ने पहले भी कई लोगों को मारा है, जैसे न्यूक्लियर वैज्ञानिक और मिलिटेंट लीडर। लेकिन खामेनेई जैसा बड़ा नेता मारना बहुत बड़ा कदम है। न्यूक्लियर डील को लेकर विवाद अमेरिका-ईरान के बीच विवाद चल रहा था अमेरिका और ईरान के बीच न्यूक्लियर डील को लेकर विवाद चल रहा था। बातचीत के बीच जनवरी 2025 से ही अमेरिका ने ईरान को घेरना शुरू कर दिया था। फरवरी में दूसरे हफ्ते से अमेरिकी कैरियर USS जेराल्ड फोर्ड और USS अब्राहम लिंकन भी पहुंच चुके थे। मिडिल ईस्ट में 2003 में इराक पर हमले के बाद से ये अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य तैनाती थी। 17 फरवरी को अमेरिका और ईरान के बीच डील पर जेनेवा में दूसरे दौर की बातचीत असफल हो गई। इसके बाद अमेरिका ने अपने करीब 150 फाइटर जेट्स, फ्यूल टैंकर विमान आदि तैनात करने शुरू कर दिए। 24 फरवरी को इजराइल के बेन गुरियन हवाई अड्डे और इजराइल के ओवदा एयरबेस पर 12 F-22 तैनात किए गए। अब जानिए ईरान-इजराइल और अमेरिका जंग में अब तक क्या हुआ… ------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… दावा-खामेनेई के बेटे बन सकते हैं ईरान के सुप्रीम लीडर:2 साल से सत्ता संभालने की ट्रेनिंग ले रहे थे; आखिरी फैसला 88 मौलवी करेंगे अमेरिका-इजराइल के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनकी जगह कौन लेगा। यह सवाल इसलिए भी, क्योंकि ईरान का सुप्रीम लीडर राष्ट्रपति से भी ज्यादा ताकतवर होता है। पूरी खबर पढ़ें…
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अमेरिका-इजराइल की ईरान से जंग, 30 PHOTOS:ईरान में खामेनेई की मौत पर रोतीं-बिलखतीं महिलाएं,सरकारी इमारतें तबाह; वॉशिंगटन में जश्न
अमेरिका-इजराइल के हमलों में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान में 40 दिन का शोक है। रविवार सुबह से ही खामेनेई समर्थकों ने सड़कों पर मातम मनाया। शोक सभाएं और विरोध-प्रदर्शन किया। उधर, कई शहरों से जश्न की खबरें भी आईं। अमेरिका-जापान में भी खामेनेई विरोधियों ने खुशी जताई। अमेरिका-इजराइल के ईरान पर हमले और फिर ईरान की जवाबी कार्रवाई में इजराइल और मिडिल-ईस्ट के 9 देशों में बने हालात को 35 तस्वीरों में देखिए... खामेनेई की मौत के बाद ईरान में मातम की 5 तस्वीरें… खामेनेई की मौत के बाद जश्न की 3 तस्वीरें दुनियाभर में विरोध-प्रदर्शन की 5 फोटोज अमेरिका-इजराइल की ईरान पर हमले की 10 तस्वीरें… इजराइल में ईरान के हमले की 5 तस्वीरें… ईरान ने जवाबी हमलों की 7 तस्वीरें…
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इजराइल-ईरान जंग; दुबई में बुर्ज खलीफा के पास हमला:एयरपोर्ट बंद, दुनियाभर की फ्लाइट्स पर असर; एअर इंडिया की लंदन, टोरंटो, पेरिस, शिकागो उड़ानें रद्द
इजराइल-ईरान जंग के बीच मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से बिगड़ गए हैं, जिसका असर दुबई से लेकर भारत तक दिखाई दे रहा है। दुबई की मशहूर इमारत बुर्ज खलीफा के पास ड्रोन हमला हुआ। एहतियातन बुर्ज खलीफा को खाली करा दिया गया और उसकी लाइट्स बंद कर दी गईं। हमले के बाद दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट और अल मकतूम एयरपोर्ट पर उड़ानों का संचालन अगले आदेश तक रोक दिया गया। कई देशों ने अपना एयरस्पेस अस्थायी रूप से बंद कर दिया, जिससे दुनियाभर की फ्लाइट्स प्रभावित हुईं। एयर इंडिया ने घोषणा की है कि 1 मार्च को लंदन, टोरंटो, फ्रैंकफर्ट, पेरिस और शिकागो के लिए उसकी सभी निर्धारित उड़ानें रद्द कर दी गई हैं। DGCA ने भी एयरलाइंस को 11 देशों के एयरस्पेस से बचने की सलाह दी है। यात्रियों को एयरपोर्ट न जाने और अपनी एयरलाइंस से ताजा जानकारी लेने की सलाह दी गई है। बुर्ज खलीफा पर हमला, खाली कराया गया पैसेंजर्स के लिए एडवाइजरी जारी दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट और अल मकतूम इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर फ्लाइट ऑपरेशन पर अगले नोटिस तक रोक दिए गए हैं। पैसेंजर्स को सलाह दी गई है कि वे एयरपोर्ट न जाएं और लेटेस्ट फ्लाइट शेड्यूल अपडेट के लिए सीधे अपनी एयरलाइंस से पता करें। UAE, कतर, बहरीन और कुवैत ने कुछ समय के लिए अपने एयरस्पेस को बंद कर दिया था, जिससे एयरलाइंस को सावधानी के तौर पर सर्विस कैंसिल, रीरूट या सस्पेंड करनी पड़ीं। एअर इंडिया बोला- हम नजर रख रहे हैं एअर इंडिया ने कहा कि हम अपने फ्लाइट ऑपरेशन के लिए सुरक्षा माहौल का आकलन करते रहेंगे और जरूरत के हिसाब से ऑपरेशन को पहले से एडजस्ट करेंगे। फ्लाइट ट्रैकिंग वेबसाइट Flightradar24.com पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, बोइंग 777 एयरक्राफ्ट से ऑपरेट की गई यह फ्लाइट पांच घंटे से ज्यादा समय तक हवा में रही और एयरलाइन ने सऊदी अरब के एयरस्पेस में आने पर वापस लौटने का फैसला किया। एयर इंडिया ने भी इस अचानक हुई स्थिति की वजह से यात्रियों को हुई परेशानी के लिए खेद जताया। इस बीच, इंडिगो ने कहा कि वह ईरान और उसके एयरस्पेस से जुड़े रीजनल अपडेट्स पर करीब से नजर रख रहा है। ईरान में करीब 9 हजार भारतीय छात्र; इजराइल में 40 हजार से ज्यादा लोग हैं ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट बंद करने की दिशा में कदम बढ़ाया ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने की दिशा में कदम उठाए हैं। खाड़ी क्षेत्र में मौजूद जहाजों को ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की ओर से हाई-फ्रीक्वेंसी रेडियो संदेश भेजे जा रहे हैं, जिनमें चेतावनी दी गई है कि इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से जहाजों को गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी। होर्मुज स्ट्रेट क्या है? होर्मुज स्ट्रेट एक संकरा जलमार्ग है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से और आगे अरब सागर से जोड़ता है। इसके उत्तर में ईरान सटा है। दक्षिण में ओमान और संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE है। इसके आसपास सभी तेल उत्पादक देश हैं। इसलिए इस जलीय रास्ते से दुनियाभर में तेल की सप्लाई होती है। होर्मुज स्ट्रेट करीब 167 किमी लंबा है। इसके दोनों मुहाने करीब 50 किमी चौड़े हैं, जबकि सबसे संकरा हिस्सा करीब 33 किमी चौड़ा है। इसमें आने-जाने वाले समुद्री ट्रैफिक के लिए 3 किमी चौड़ी शिपिंग लेन तय है। बाजार: गिरावट की आशंका; सोने-चांदी में फिर तेजी का दौर संभव ईरान पर हमले का वैश्विक बाजारों में नकारात्मक असर दिख सकता है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, सोमवार को भारतीय शेयर बाजार में गिरावट दिख सकती है। केडिया एडवाइजरी के अजय केडिया के मुताबिक, युद्ध लंबा खिंचा तो सुरक्षित निवेश के लिए सोना-चांदी की कीमतों में फिर तेजी का दौर दिख सकता है।
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तारिक रहमान के पीएम बनते ही बांग्लादेशी सेना में फेरबदल:भारत में रक्षा सलाहकार को वापस बुला प्रमोशन दिया; चीफ ऑफ जनरल स्टाफ भी बदला
तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने के कुछ दिन बाद बांग्लादेशी सेना में बड़े पैमाने पर फेरबदल किया गया है। रविवार को जारी आदेशों में ऑपरेशनल और इंटेलिजेंस पदों पर नई नियुक्तियां की गईं, जबकि भारत में रक्षा सलाहकार को भी नई जिम्मेदारी दी गई है। भारत में बांग्लादेश के रक्षा सलाहकार ब्रिगेडियर जनरल एमडी हाफिजुर रहमान को मेजर जनरल पद पर प्रमोट किया गया है। उन्हें वापस बुलाकर 55वीं इन्फैंट्री डिविजन का जनरल ऑफिसर कमांडिंग (GOC) नियुक्त किया गया है। लेफ्टिनेंट जनरल मुहम्मद मैनूर रहमान को सेना का चीफ ऑफ जनरल स्टाफ (CGS) बनाया गया है। वे इससे पहले आर्मी ट्रेनिंग एंड डॉक्ट्रिन कमांड के प्रमुख थे। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल मिजानुर रहमान शमीम की जगह ली है, जिन्हें रिटायरमेंट लीव पर भेज दिया गया था। आर्म्ड फोर्सेस डिवीजन और फील्ड कमांड में बदलाव मेजर जनरल कैसर राशिद चौधरी को डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फोर्सेस इंटेलिजेंस (DGFI) का डायरेक्टर नियुक्त किया गया है। वे आर्मी मुख्यालय में ब्रिगेडियर जनरल के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने मेजर जनरल मोहम्मद जहांगीर आलम की जगह ली है, जिन्हें फिलहाल विदेश मंत्रालय में राजदूत के रूप में नियुक्त किया गया है। लेफ्टिनेंट जनरल मीर मुशफिकुर रहमान को सशस्त्र बल डिविजन का प्रिंसिपल स्टाफ ऑफिसर (PSO) बनाया गया है। वे इससे पहले चटगांव स्थित 24वीं इन्फैंट्री डिविजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग(GOC) थे। मौजूदा PSO लेफ्टिनेंट जनरल एसएम कामरुल हसन को विदेश मंत्रालय में राजदूत के पद पर ट्रांसफर कर दिया गया है। मेजर जनरल जेएम एमदादुल इस्लाम को ईस्ट बंगाल रेजिमेंटल सेंटर का कमांडेंट नियुक्त किया गया है। वहीं मेजर जनरल फिरदोस हसन सलीम को 24वीं इन्फैंट्री डिविजन का GOC बनाया गया है। बांग्लादेश सेना में फेरबदल क्यों हुआ? ये बड़ा फेरबदल तारिक रहमान की नई BNP सरकार के लिए सेना पर अपनी मजबूत पकड़ बनाने का पहला बड़ा कदम माना जा रहा है। फरवरी 2024 में छात्र आंदोलन से शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनी थी, जिसने सेना के कई शीर्ष पदों पर अपने करीबी या पुरानी व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों को तैनात किया था। अब 12 फरवरी 2026 के चुनाव में BNP की भारी जीत के बाद तारिक रहमान 17 फरवरी को प्रधानमंत्री बने, तो नई सरकार ने जल्दी से इन पदों पर बदलाव किए। इसके पीछे मुख्य वजह यह माना जा रहा है कि पुराने अधिकारियों (जो यूनुस सरकार या हसीना काल से जुड़े थे) को हटाकर BNP के करीबी या नई सरकार के प्रति वफादार अधिकारियों को महत्वपूर्ण कमांड और खुफिया पद दे रही है, ताकि सेना नई सरकार के खिलाफ कोई असंतुलन पैदा न करे और सेना मजबूत हो सके। इस फेरबदल से क्या फायदा कुल मिलाकर, ये फेरबदल नई सरकार की 'पावर कंसोलिडेशन' का हिस्सा है। यानी सत्ता को मजबूत करना और पुरानी व्यवस्था से जुड़े जोखिमों को खत्म करना। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे तारिक रहमान की सरकार को अगले कुछ महीनों में ज्यादा स्थिरता मिलेगी। तारिक रहमान पर चुनाव में गड़बड़ी का आरोप सेना में फेरबदल के बीच बांग्लादेश में विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान पर चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि तारिक रहमान चुनाव नतीजों में हेरफेर करने वाले इंजीनियर हैं। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव में 'इंजीनियरिंग' यानी हेरफेर की गई और इसी वजह से BNP को 200 से ज्यादा सीटें मिलीं। बांग्लादेश में करीब 20 साल बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने आम चुनाव में बड़ी जीत हासिल की। जमात ए इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन और उसकी सहयोगी पार्टी नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) ने आरोप लगाया है कि कई सीटों पर बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई। ------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… पाकिस्तानी रक्षा मंत्री बोले- मुनीर मेरे बॉस नहीं: सेना अब सरकार नहीं चलाती, इतिहास में दखल था, अब सिस्टम अलग है पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि फील्ड मार्शल आसिम मुनीर उनके बॉस नहीं हैं। उन्होंने साफ किया कि उनके बॉस प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ हैं। पूरी खबर पढ़ें…
https://www.bhaskar.com/international/news/bangladesh-army-reshuffle-defense-advisor-promotion-chief-general-staff-change-137277685.html
पंजाब पुलिस के ASI-होमगार्ड की हत्या:क्या है TTH जिसने इसकी जिम्मेदारी ली, PAK में एक्टिव टेररिस्ट ग्रुप TTP से इसका क्या संबंध, सभी सवालों के जवाब
गुरदासपुर में पाकिस्तान सीमा से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर भारतीय क्षेत्र में आदियां गांव में बनी पंजाब पुलिस की चौकी में ड्यूटी पर तैनात ASI गुरनाम सिंह और होमगार्ड अशोक कुमार की हत्या कर दी गई। ASI के सिर और होमगार्ड के सीने में गोली मारी गई। शनिवार और रविवार की दरमियानी रात हुईं इन हत्याओं की जिम्मेदारी तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान नाम के आतंकी संगठन ने ली है। संगठन की ओर से इसके लिए बाकायदा एक लेटर जारी किया गया, जिसमें लिखा है- आज 22 फरवरी 2026 को तड़के गजवा-ए-हिंद में एक और सफलता हासिल हुई, जब तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान के अल-बुर्क ब्रिगेड ने दुरंगला पुलिस स्टेशन पर हमला किया। तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान ने इस हमले की जिम्मेदारी स्वीकार की है, जिसमें दो पुलिसकर्मी शहीद हो गए। भविष्य में भारतीय सरकारी वर्दीधारी अधिकारियों के खिलाफ ऐसे हमले और भी तीव्र रूप से जारी रहेंगे। जनता को सलाह दी जाती है कि वे सेना, पुलिस और बीएसएफ बलों से इस्तीफा दे दें, अन्यथा उन्हें उनके घरों में निशाना बनाया जाएगा। हालांकि, स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने इस लेटर की पुष्टि नहीं की। गुरदासपुर के SSP आदित्य ने कहा कि इस आतंकी संगठन की वायरल पोस्ट की जांच की जा रही है। उन्होंने ऐसे किसी आतंकी संगठन के सक्रिय होने के भी पुष्टि नहीं की। क्या है आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान (TTH), जिसने दोनों पुलिसवालों की हत्या की जिम्मेदारी ली? क्या इसका अफगानिस्तान में एक्टिव आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से कोई संबंध है? संगठन ने पंजाब में हमला क्यों किया? जानिए सभी सवालों के जवाब… सवाल नं. 1- क्या है तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान? जवाब - जिस आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान (TTH) ने गुरदासपुर में पुलिसवालों की हत्या की जिम्मेदारी ली है, पुलिस के मुताबिक इस नाम से कोई ऑफिशियल या एक्टिव टेररिस्ट ग्रुप अस्तित्व में नहीं है। यह नाम असल में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) का एक पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा वर्जन है, जिसे भारत विरोधी नैरेटिव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह नाम कभी-कभी अफवाहें फैलाने या सोशल मीडिया पर प्रचार के रूप में इस्तेमाल होता है। अब तक किसी बड़ी वारदात में इसका नाम नहीं आया। TTP को पाकिस्तान में फितना अल-हिंदुस्तान के नाम से भी संबोधित किया जाने लगा है। सवाल नं. 2 - TTH का TTP से क्या संबंध है? जवाब - माना जाता है कि TTH को भारत में दहशत फैलाने के लिए TTP ने ही बनाया गया था, लेकिन आधिकारिक रूप से इसकी दहशतगर्दी के निशान अब तक भारत में कहीं मिले नहीं हैं। TTP ने 2013 में एक बयान में कहा था कि वे भारत में भी शरिया लागू करना चाहते हैं और कश्मीर में सक्रिय होने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, उसके बाद कोई बड़ा ऑपरेशन या तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान नाम का ग्रुप भारत में सामने नहीं आया। यह ज्यादातर प्रचार या धमकी का हिस्सा था। सवाल नं. 3 - TTP पाकिस्तान में क्यों दहशत फैला रहा? जवाब - तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) पाकिस्तान में एक प्रमुख दहशतगर्द संगठन है। इसे 2007 में बनाया गया। इसका मुख्य लक्ष्य पाकिस्तान में शरिया आधारित अमीरात कायम करना है। यह अफगान तालिबान से अलग है, लेकिन विचारधारा में काफी करीब है। TTP पाकिस्तान में सेना, पुलिस और नागरिकों पर हमले करता रहता है। पाकिस्तान सरकार और सेना TTP को भारत समर्थित बताकर भारत पर आरोप लगाती है। पाक PM शहबाज शरीफ और अन्य अधिकारियों ने कई बार कहा है कि TTP के हमले अफगानिस्तान से हो रहे हैं और भारत उनका बैकिंग कर रहा है। भारत ने इन आरोपों को बार-बार खारिज किया है और इन्हें पाकिस्तान की अपनी असफलताओं को छिपाने की कोशिश बताया है। सवाल नं. 4 - TTH ने पंजाब में हमला क्यों किया? जवाब - पंजाब में गुरदासपुर के दुरंगला पुलिस पोस्ट पर तैनात 2 पुलिसकर्मियों की गोली मारकर हत्या की गई। रविवार शाम (22 फरवरी) को सोशल मीडिया पर पोस्टर शेयर किए गए, जिनमें तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान नाम का ग्रुप जिम्मेदारी ले रहा था। पोस्टर पाकिस्तान-बेस्ड होने का दावा किया गया। हालांकि, पंजाब पुलिस ने स्पष्ट कहा है कि यह ग्रुप पंजाब में या पूरे भारत में कहीं भी मौजूद नहीं है। यह दावा फर्जी या प्रोपेगैंडा है। पुलिस ने इसे खारिज कर दिया है और जांच जारी है। बड़ी बात यह है कि पोस्टर में कहीं इस बात का जिक्र नहीं किया गया कि ये हत्याएं क्यों की गईं। पोस्टर में भारतीय सुरक्षाबलों को चेतावनी जरूर दी गई कि वे इस्तीफा दे दें, नहीं तो उन्हें घर में घुसकर निशाना बनाया जाएगा। अंत में दोनों पुलिसवालों की मौत का पूरा मामला जानिए… गुरदासपुर में दुरंगला पुलिस पोस्ट पर तैनात ASI गुरनाम सिंह और होमगार्ड जवान अशोक कुमार की शनिवार रात गोली मारकर हत्या कर दी गई। चौकी में ASI की डेडबॉडी कुर्सी पर तो होमगार्ड की चारपाई में रजाई के अंदर मिली। जिस पोस्ट पर इनकी लाश मिली, वह भारत-पाकिस्तान इंटरनेशनल बॉर्डर से महज डेढ़ किमी दूर है। दोनों पुलिसकर्मियों की ड्यूटी इसी पुलिस चौकी में थी। इनके अलावा कोई तीसरा यहां तैनात नहीं था। पुलिस जांच में गोलियों के करीब 4 खोल मिले। SSP बोले- मामले की जांच चल रही गुरदासपुर के SSP आदित्य ने बताया कि घटना की सूचना मिलते ही वह मौके पर पहुंचे। पुलिस पोस्ट पर तैनात 2 पुलिसकर्मियों की गोली लगने से मौत हुई है। दोनों जवान मृतक हालत में चौकी के कमरे में मिले थे। फॉरेंसिक टीमें मौके पर जांच कर रही हैं। उनसे जब पूछा गया कि इस मामले में आतंकी हमले या गैंगस्टरों के कत्ल करने से भी जोड़ा जा रहा है, तो उन्होंने कहा कि पुलिस हर एंगल से मामले की जांच कर रही है। उन्होंने कहा- हमारी तकनीकी और फोरेंसिक टीम जांच कर रही हैं। ॰॰॰॰॰॰॰ यह खबर भी पढ़ें… आतंकी संगठन का दावा- ASI-होमगार्ड जवान की हत्या हमने की:गुरदासपुर पुलिस चौकी में मिली लाशें; TTH बोला- आर्मी-BSF-पुलिस छोड़ें वर्ना घर टारगेट करेंगे गुरदासपुर में पंजाब पुलिस की चौकी में ASI और होमगार्ड की गोली लगने से मौत हो गई। चौकी में एक की डेडबॉडी कुर्सी पर तो दूसरे की चारपाई में रजाई के अंदर मिली। मौत का पता तब चला, जब चौकी में किसी ने उनका फोन नहीं उठाया। पूरी खबर पढ़ें…
https://www.bhaskar.com/local/punjab/gurdaspur/news/punjab-police-asi-homeguard-murder-gurdaspur-tth-ttp-terror-137272443.html
ट्रम्प की बोर्ड ऑफ पीस मीटिंग में भारत शामिल हुआ:गाजा के लिए ₹1.5 लाख करोड़ के राहत पैकेज का ऐलान; 50 देशों के प्रतिनिधि पहुंचे
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली बैठक में भारत ने गुरुवार को ऑब्जर्वर देश के रूप में हिस्सा लिया। यह बैठक गुरुवार को वॉशिंगटन डीसी में हुई। भारत की तरफ से भारतीय दूतावास में तैनात चार्ज द’अफेयर्स (सीनियर अधिकारी) नमग्या सी खम्पा ने बैठक में भाग लिया। भारत ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि वह बोर्ड का पूरा सदस्य बनेगा या नहीं। भारत ने पिछले महीने दावोस में इसके लॉन्च कार्यक्रम में भी हिस्सा नहीं लिया था। 'बोर्ड ऑफ पीस' की बैठक में गाजा के पुनर्निर्माण के लिए 1.4 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज का ऐलान किया गया है। ट्रम्प ने कहा कि 9 सदस्य देशों ने गाजा राहत पैकेज के लिए 63 हजार करोड़ रुपए (7 अरब डॉलर) देंगे। जबकि, अमेरिका खुद 90 हजार करोड़ रुपए (10 अरब डॉलर) देगा। वहीं, 5 देशों ने युद्ध से तबाह फिलिस्तीनी इलाके में सैनिक तैनात करने पर सहमति दी है। वॉशिंगटन में हुई इस बैठक में करीब 50 देशों के अधिकारी शामिल हुए। इनमें से 27 देश बोर्ड के सदस्य हैं, जिनमें अजरबैजान, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, इजराइल, जॉर्डन, मोरक्को, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्की, UAE, उज्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं। भारत और यूरोपीय संघ (EU) सहित बाकी देश ऑब्जर्वर के तौर पर शामिल हुए। बोर्ड ऑफ पीस की 3 तस्वीरें… ट्रम्प बोले- ये रकम युद्ध पर खर्च के मुकाबले बहुत छोटी ट्रम्प ने कहा कि यह रकम युद्ध पर होने वाले खर्च के मुकाबले बहुत छोटी है। उन्होंने सदस्य देशों से कहा कि अगर सभी देश साथ आएं तो उस इलाके में स्थायी शांति लाई जा सकती है, जो सदियों से युद्ध और हिंसा झेलता आया है। ट्रम्प ने कहा कि गाजा पर खर्च किया गया हर डॉलर इलाके में स्थिरता लाने और बेहतर भविष्य बनाने में निवेश है। हालांकि, उन्होंने यह साफ नहीं किया कि कितने सैनिक भेजे जाएंगे, वे कब तैनात होंगे और दी गई रकम का इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा। UN की निगरानी करेगा ट्रम्प का बोर्ड ऑफ पीस 5 देशों ने युद्ध से तबाह फिलिस्तीनी इलाके में सैनिक तैनात करने पर सहमति दी है। ट्रम्प ने यह भी साफ किया कि यह बोर्ड अब दुनिया भर के संघर्ष सुलझाने में भी भूमिका निभाएगा। ट्रम्प ने कहा, बोर्ड संयुक्त राष्ट्र (UN) की निगरानी करेगा और सुनिश्चित करेगा कि वह ठीक से काम कर रहा है। वहीं, 'बोर्ड ऑफ पीस' की पहली बैठक से ठीक पहले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की बैठक हुई। इसमें वेस्ट बैंक में इजरायल के नियंत्रण बढ़ाने के प्रयासों की तीखी आलोचना की गई। पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ शामिल हुए बैठक में भारत समेत ज्यादातर देशों ने सीनियर अधिकारियों को भेजा। वहीं पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो, अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर माइली और हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन खुद पहुंचे। जर्मनी, इटली, नॉर्वे, स्विट्जरलैंड और ब्रिटेन उन देशों में हैं, जो बोर्ड में शामिल नहीं हुए हैं, लेकिन ऑब्जर्वर के तौर पर भाग ले रहे हैं। ट्रम्प ने दावा किया, 'सभी ने गाजा पर प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है और जिन्होंने नहीं माना है वे भी जल्द इसे मान लेंगे।' बैठक की चर्चा का केंद्र एक ऑर्मड इंटरनेशनल स्टैबलाइजेशन फोर्स बनाना रहा, जिसका काम सुरक्षा बनाए रखना और हमास को निरस्त्र कराना होगा। यह इजराइल की प्रमुख मांग है और सीजफायर डील का अहम हिस्सा भी। हालांकि हमास ने अब तक निरस्त्रीकरण को लेकर बहुत भरोसा नहीं दिलाया है। हमास बोला- जब तक इजराइली सेना यहां है, हथियार नहीं छोड़ेंगे दूसरी ओर हमास ने कहा है कि जब तक इजराइली सेना पूरी तरह नहीं हटती, वह हथियार नहीं डालेगा। हाल ही में हमास लीडर ओसामा हमदान ने अल जजीरा को दिए इंटरव्यू में कहा कि संगठन ने अभी तक हथियारों पर कोई औपचारिक फैसला नहीं लिया है। वहीं, इजराइल का कहना है कि जब तक हमास पूरी तरह हथियार नहीं छोड़ता, सेना गाजा से नहीं हटेगी। इजराइल ने हमास को 60 दिन का समय दिया है कि वह पूरी तरह हथियार छोड़ दे। ट्रम्प के दामाद और वार्ताकार जेरेड कुशनर ने दावोस में गाजा के दक्षिणी हिस्से में छह नए शहर बसाने और समुद्री तट पर पर्यटन परियोजना बनाने की योजना पेश की थी। हालांकि, इसके लिए फंडिंग और समय-सीमा अभी तय नहीं है। बोर्ड ऑफ पीस क्या है? ट्रम्प ने पहली बार पिछले साल सितंबर 2025 में गाजा युद्ध खत्म करने की योजना पेश करते हुए इस बोर्ड का प्रस्ताव रखा था। रॉयटर्स के मुताबिक, अमेरिका ने करीब 60 देशों को इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता भेजा है। पिछले हफ्ते दुनिया के नेताओं को भेजे गए न्योते में बताया गया कि इस बोर्ड की भूमिका सिर्फ गाजा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर संघर्षों को सुलझाने में भी काम करेगा। भेजे गए एक मसौदा (चार्टर) में कहा है कि जो देश तीन साल से ज्यादा समय तक इस बोर्ड का सदस्य बनना चाहते हैं, उन्हें 1 अरब डॉलर का योगदान देना होगा। ट्रम्प खुद इस बोर्ड के अध्यक्ष हैं ट्रम्प खुद इस बोर्ड के अध्यक्ष हैं। वे चाहते हैं कि यह बोर्ड सिर्फ गाजा के युद्धविराम तक सीमित न रहे, बल्कि दूसरे मुद्दों पर भी काम करे। हालांकि, इससे कुछ देशों को चिंता है कि इससे ग्लोबल डिप्लोमेसी में UN की भूमिका कमजोर हो सकती है। ट्रम्प ने कहा कि जब यह बोर्ड पूरी तरह बन जाएगा, तब यह बड़े फैसले ले सकेगा और जो भी काम होगा, वह UN के सहयोग से किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि UN में बहुत क्षमता है, लेकिन उसका अब तक पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के पांच स्थायी सदस्यों में से अमेरिका के अलावा किसी भी देश ने अभी तक इस बोर्ड में शामिल होने की पुष्टि नहीं की है। बैठक में ट्रम्प ने ईरान को 10 दिन का अल्टीमेटम दिया इंटरनेशनल स्टैबलाइजेशन फोर्स के प्रमुख मेजर जनरल जैस्पर जेफर्स ने कहा कि योजना के तहत गाजा के लिए 12,000 पुलिस और 20,000 सैनिकों की जरूरत होगी। बैठक के दौरा राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए '10 दिनों का अल्टीमेटम' दिया है। ट्रम्प ने कहा कि अगले 10 दिनों में यह साफ हो जाएगा कि ईरान के साथ कोई समझौता होगा या अमेरिका को सैन्य कार्रवाई का रास्ता चुनना पड़ेगा। ट्रम्प ने कहा कि ईरान के साथ समझौता करना आसान नहीं रहा है, लेकिन अगर इस बार सहमति नहीं बनी तो हमें एक कदम आगे (सैन्य कार्रवाई की ओर) बढ़ना पड़ सकता है।
https://www.bhaskar.com/international/news/us-trump-board-peace-meeting-india-gaza-aid-pakage-137251426.html
ब्राजील कार्निवल, उमड़ा जनसैलाब, टूटेगा रिकॉर्ड:6.5 करोड़ लोगों की भीड़ और 190 करोड़ का बजट, सांबा की धुन पर थिरकी दुनिया
दुनिया के सबसे बड़े उत्सवों में से एक बाजील कार्निवल चरम पर पहुंच चुका है। 13 फरवरी से शुरू हुआ उत्सव अलग-अलग शहरों के बाद अब रियो डी जेनेरियों में दस्तक दे चुका है। 21 फरवरी तक चलने वाले कार्निवल में रिकॉर्ड तोड़ भीड़ उमड़ रही है। इस साल अनुमान है कि लगभग 6.5 करोड़ लोग शामिल होंगे। अलग-अलग शहरों में कार्निवाल में 4 हजार से ज्यादा कलाकार हिस्सा ले रहे हैं। रियो डी जेनेरियो में ही करीब 80 लाख लोगों के आने की उम्मीद है।
कलाकार और सांबा स्कूल भाग ले रहे हैं रियो में परेड का केंद्र सांबाडीम है, जहां 12 टॉप-लीग सांबा स्कूल मुख्य प्रतियोगिता में उतर रहे हैं। इनके साथ दर्जनों स्कूल निचली डिवीजनों में परेड करते हैं। हर बड़े सांबा स्कूल में हजारों डांसर, म्यूजीशियन, कारीगर, कॉस्ट्यूम डिजाइनर टेलर और सेट बनाने वाले लोग जुड़े होते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक अकेले एक उभरते स्कूल पाड़े मिग्वेल का बजट करीब 190 करोड़ रु है। अकेले रियो में हर साल करीब 70.000 अस्थायी नौकरियां मिलती हैं। इसमें सुरक्षा, सफाई, स्टाल, होटल रेस्तरां स्टाफ, इवेंट मैनेजमेंट शामिल हैं।
https://www.bhaskar.com/g/international/news/brazil-carnival-crowds-throng-record-set-to-be-broken-137244224.html
अमेरिकी सांसद बोले-कुत्तों और मुसलमानों में एक को चुनना आसान:फिलिस्तीनी एक्टिविस्ट के 'डॉग बैन' पोस्ट पर जवाब दिया; एक्सपर्ट बोले- यह नस्लवादी, सांसद इस्तीफा दे
अमेरिकी सांसद रैंडी फाइन के एक सोशल मीडिया पोस्ट से बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने X पर लिखा कि अगर कुत्तों और मुसलमानों में से चुनना पड़े तो यह मुश्किल फैसला नहीं है। दरअसल, रैंडी फाइन ने यह टिप्पणी न्यूयॉर्क में एक फिलिस्तीनी-अमेरिकी एक्टिविस्ट नेरदीन किसवानी की पोस्ट के जवाब में की थी। किसवानी ने लिखा था कि कुत्ते अपवित्र हैं और ऐसे समय में जब न्यूयॉर्क इस्लाम की ओर आ रहा है, कुत्तों को घर के अंदर नहीं रखना चाहिए। इसपर फाइन ने कहा कि दुनिया में 57 ऐसे देश हैं जहां शरिया कानून लागू है। अगर आप ऐसा चाहते हैं, तो वहीं चले जाइए। अमेरिका 58वां देश नहीं बनेगा। बाद में किसवानी ने कहा था कि वह बस मजाक कर रही थीं। उन्होंने कहा कि यह न्यूयॉर्क में सार्वजनिक जगहों पर कुत्तों की गंदगी को लेकर चल रही बहस से जुड़ा था। उनका कहना था कि यह उन लोगों के लिए कहा गया था, जो राजनीति में मुस्लिमों के बढ़ते प्रभाव को खतरा मानते हैं।
फाइन पर मुसलमानों को अमानवीय दिखाने का आरोप किसवानी ने होमलैंड सिक्योरिटी सेक्रेटरी क्रिस्टी नोएम के पुराने बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने अपने फार्म पर एक कुत्ते को गोली मारने की बात कही थी। किसवानी ने लिखा, ‘क्रिस्टी नोएम ने अपने ही कुत्ते को गोली मारने की बात कही और ज्यादातर लोगों ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन न्यूयॉर्क में एक मुस्लिम कह दे कि शहर पालतू जानवरों के लिए सही जगह नहीं है, तो उसे मौत की धमकियां मिलने लगती हैं।’ उन्होंने फाइन पर फिलिस्तीनियों और मुसलमानों को अमानवीय दिखाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की ओर से आ रही मुस्लिम विरोधी भाषा पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती। फाइन के खिलाफ कार्रवाई की मांग तेज रैंडी फाइन के इस बयान पर वॉशिंगटन में भारी विरोध हुआ है। डेमोक्रेट्स, सिविल राइट्स ग्रुप्स और कई नेताओं ने इसे इस्लामोफोबिया और घृणा फैलाने वाला बताया। अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस काउंसिल (CAIR) ने फाइन के खिलाफ कार्रवाई की मांग की और कहा कि उनके इस्तीफे की मांग पहले से चल रही है। यासमिन अंसारी ने हाउस स्पीकर से तुरंत निंदा करने को कहा। कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम ने फाइन को नस्लवादी कहकर इस्तीफा देने को कहा। ब्रिटिश पत्रकार पियर्स मॉर्गन ने भी उन्हें कड़ी फटकार लगाई। फाइन बोले- कुत्ते हमारे परिवार के सदस्य, इन्हें नहीं छोड़ेंगे फाइन ने विरोध पर पलटवार किया और कहा कि असली समस्या किसवानी का बयान है, जो लिखित रूप में था। फाइन ने न्यूजमैक्स को दिए इंटरव्यू में कहा कि उनका पोस्ट किसवानी के बयान के जवाब में था, जो शरिया लॉ (इस्लामी कानून) थोपने की कोशिश है। उन्होंने कहा, ‘अमेरिका में कुत्ते परिवार के सदस्य हैं, और हम यूरोप की तरह शर्मिंदा होकर हार नहीं मानेंगे।’ उन्होंने कुत्तों की तस्वीरें शेयर कीं, जिन पर ‘डोंट ट्रेड ऑन मी’ (ऐतिहासिक गैड्सडेन फ्लैग का स्लोगन) लिखा था। इस पोस्ट को 42 मिलियन से ज्यादा व्यूज मिले, हजारों लाइक्स, रीपोस्ट्स और कमेंट्स। फाइन ने क्रिटिक्स को जवाब दिया कि किसवानी का बयान लिखित था और लाखों ने देखा। पोस्ट के तुरंत बाद वॉशिंगटन और पूरे अमेरिका में हंगामा मच गया। इसे इस्लामोफोबिया, बिगॉट्री (कट्टरता) और डीह्यूमनाइजेशन कहा गया। फाइन इजराइल के मजबूत समर्थक माने जाते हैं। वह पहले भी गाजा से जुड़े बयानों पर आलोचना झेल चुके हैं। 2025 में उन्होंने गाजा पर कहा था कि गाजावासियों को भूखा मरने दो जब तक इजराइली बंधक रिहा न हों। उन्होंने गाजा का हाल हिरोशिमा और नागासाकी जैसा करने की बात भी की थी, जिस पर कुछ रिपब्लिकन्स ने भी निंदा की।
फाइन बोले- यूरोप की तरह कमजोरी नहीं दिखाएंगे फाइन का कहना है कि यूरोप के लोग मुसलमानों के सामने शर्मिंदा होकर या दबाव में आकर अपनी संस्कृति, परंपराओं और आजादी को खो चुके हैं। वे नहीं चाहते कि अमेरिका में भी ऐसा हो। उनका कहना है कि अमेरिका, यूरोप जैसी कमजोरी नहीं दिखाएंगे। फाइन और उनके जैसे कई राइट-विंग ट्रम्प समर्थक अक्सर यह दावा करते हैं कि यूरोप में इस्लामिक टेकओवर हो रहा है। उनके अनुसार बड़े पैमाने पर मुस्लिम इमिग्रेशन से नो-गो जोन्स बन गए हैं, जहां स्थानीय कानून कमजोर पड़ गए हैं। यूरोपीय सरकारें पॉलिटिकल करेक्टनेस या मल्टीकल्चरलिज्म के नाम पर मुसलमानों की मांगों के आगे झुक रही हैं, जैसे कुत्तों पर प्रतिबंध या महिलाओं के अधिकारों में बदलाव। इसका नतीजा यह हो रहा है की यूरोप अपनी मूल संस्कृति और वैल्यूज खो रहा है और लोग शर्मिंदा होकर विरोध नहीं कर पा रहे। फाइन ने खुद कई बार कहा है कि शरिया अमेरिका में नहीं आएगी। अमेरिका इस्लामिक देश नहीं बनेगा। उन्होंने नो शरीया जैसा बिल भी पेश किया है। इजराइल के कट्टर समर्थक माने जाते हैं फाइन रैंडी फाइन एक अमेरिकी राजनेता हैं, जो रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े हैं। उनका जन्म 20 अप्रैल 1974 को एरिजोना के ट्यूसन शहर में हुआ था। उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से 1996 में एबी डिग्री और 1998 में एमबीए पूरा किया। पेशे से वे बिजनेस एक्जीक्यूटिव हैं और पहले जुआ इंडस्ट्री में काम कर चुके हैं। राजनीति में उन्होंने फ्लोरिडा स्टेट हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 2016 से 2024 तक सेवा की, फिर फ्लोरिडा संसद में 2024-2025 तक रहे। अप्रैल 2025 में एक स्पेशल इलेक्शन में वे फ्लोरिडा के 6वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से यूएस हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के लिए चुने गए। वे इजराइल के कट्टर समर्थक हैं और अक्सर फिलिस्तीन-इजरायल संघर्ष पर विवादास्पद बयान देते हैं।
https://www.bhaskar.com/international/news/us-lawmaker-randy-fine-muslims-dogs-controversy-137235640.html
ट्रम्प बोले- ईरान के साथ बातचीत में इनडायरेक्टली शामिल रहूंगा:पिछले साल परमाणु ठिकानों पर बमबारी से इन्हें अक्ल आई; आज स्विट्जरलैंड में बैठक
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोमवार को कहा कि वह अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत में इनडायरेक्ट रूप से शामिल रहेंगे। उन्होंने एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान यह बात कही। यह बयान ईरान के साथ परमाणु कार्यक्रम को लेकर दूसरे दौर की बातचीत से पहले आया है। अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की बातचीत आज (17 फरवरी 2026) जिनेवा (स्विट्जरलैंड) में हो रही है। इससे पहले ओमान में 6 फरवरी को पहली बैठक हुई थी। ट्रम्प ने कहा, ‘मैं उन बातचीत पर नजर रहूंगा।’ उन्होंने संकेत दिया कि ईरान इस बार समझौते को लेकर गंभीर है। डील की संभावना पर ट्रम्प ने कहा कि ईरान इसे लेकर सख्त रुख अपनाता रहा है, लेकिन पिछले साल अमेरिका की ईरान के परमाणु ठिकानों पर बमबारी से उसे अक्ल आई। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि वे समझौता न करने के परिणाम भुगतना चाहेंगे।’ ईरान-अमेरिका के बीच किन मुद्दों पर बातचीत होगी ईरान ने ऑपरेशनल क्षमताओं की जांच के लिए नौसैनिक अभ्यास शुरू किया एसोसिएटेड प्रेस (AP) के मुताबिक, ईरान ने सोमवार को कुछ ही हफ्तों में दूसरी बार नौसैनिक अभ्यास शुरू किया। यह अभ्यास स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज, पर्शियन गल्फ और गल्फ ऑफ ओमान में हो रहा है। इसका मकसद खुफिया और ऑपरेशनल क्षमताओं की जांच करना है। समुद्री सुरक्षा कंपनी ईओएस रिस्क ग्रुप ने कहा कि इस इलाके से गुजरने वाले जहाजों को रेडियो पर चेतावनी दी गई कि स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज के उत्तरी मार्ग में मंगलवार को लाइव-फायर ड्रिल हो सकती है। हालांकि ईरानी सरकारी टीवी ने लाइव-फायर अभ्यास का जिक्र नहीं किया। जनवरी के अंत में हुए इसी तरह के अभ्यास के दौरान अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने कड़ा बयान जारी किया था। उसने कहा था कि ईरान को अंतरराष्ट्रीय हवाई और समुद्री क्षेत्र में पेशेवर तरीके से काम करने का अधिकार है, लेकिन वह अमेरिकी वॉरशिप या ट्रेड जहाजों को परेशान न करें। ईरान के उप विदेश मंत्री बोले- ट्रम्प प्रतिबंध हटाएं तो डील संभव व्हाइट हाउस का कहना है कि वह ऐसा समझौता चाहता है, जिससे ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके। वहीं, रविवार को ईरान के उप विदेश मंत्री मजीद तख्त-रवांची ने अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर बातचीत करने की इच्छा जताई है। उन्होंने BBC को दिए इंटरव्यू में कहा कि अगर अमेरिका प्रतिबंध हटाने पर बात करने को तैयार है, तो हम अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कई मुद्दों पर समझौता करने के लिए तैयार है। वहीं अमेरिकी अधिकारी बार-बार कहते रहे हैं कि परमाणु वार्ता में प्रगति रुकने की वजह ईरान है, न कि अमेरिका। रवांची बोले- हमने 60% इंरिच्ड यूरेनियम घटाने का प्रस्ताव दिया ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु समझौता एक लंबे समय से चल रही विवादास्पद बातचीत है, जिसका मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना है। जिससे वह परमाणु हथियार न बना सके। मजीद तख्त-रवांची ने कहा कि ईरान ने 60% तक इंरिच्ड यूरेनियम को कम करने का प्रस्ताव दिया है। ईरान के पास 400 किलो से ज्यादा उच्च स्तर पर इंरिच्ड यूरेनियम का भंडार है। 2015 के परमाणु समझौते के तहत उसने अपना यूरेनियम रूस भेजा था। इस बार क्या वह ऐसा करेगा, इस पर तख्त-रवांची ने कहा कि अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। रूस ने दोबारा यह सामग्री स्वीकार करने की पेशकश की है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेहरान अस्थायी रूप से यूरेनियम इंरिचमेंट रोकने का प्रस्ताव भी दे चुका है। बैलिस्टिक मिसाइल पर विवाद अटका ईरान की एक बड़ी शर्त रही है कि बातचीत सिर्फ परमाणु मुद्दे पर हो। तख्त-रवांची ने कहा कि उनकी समझ है कि अगर समझौता करना है तो फोकस परमाणु मुद्दे पर ही रहेगा। ईरान और अमेरिका के बीच चल रही परमाणु समझौते की बातचीत में बैलिस्टिक मिसाइल प्रोजेक्ट सबसे बड़ा विवाद का मुद्दा बन गया है। ईरान इस पर बिल्कुल भी समझौता करने को तैयार नहीं है और इसे अपनी रेड लाइन मानता है। ईरान का कहना है कि यह उसके बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम रक्षा के लिए जरूरी है। जब जून 2025 में इजराइल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु साइटों पर हमला किया, तब ईरान की मिसाइलों ने ही उसकी रक्षा की। इसके साथ ही अमेरिका चाहता है कि ईरान हिजबुल्लाह, हूती जैसे प्रॉक्सी ग्रुप्स को समर्थन देना बंद करे। अमेरिका इस मुद्दे को भी शामिल करना चाहता है, लेकिन ईरान मुख्य रूप से सिर्फ परमाणु मुद्दे पर फोकस रखना चाहता है। ईरानी अधिकारियों ने बार-बार कहा है कि मिसाइल कार्यक्रम पर कोई बात नहीं होगी। यह ईरान की रक्षात्मक क्षमता है और इसे छोड़ना मतलब खुद को कमजोर करना होगा। ईरान कहता है कि बातचीत सिर्फ परमाणु कार्यक्रम तक सीमित रहेगी, मिसाइल या क्षेत्रीय समूहों पर नहीं। रवांची बोले- हमारे अस्तित्व पर खतरा हुआ तो जवाब देंगे ईरान के उप विदेश मंत्री ने ट्रम्प के बयानों पर चिंता जताई। सार्वजनिक रूप से और निजी तौर पर अमेरिका बातचीत में रुचि दिखा रहा है, लेकिन ट्रम्प ने हाल में सत्ता परिवर्तन की बात की। तख्त-रवांची ने कहा कि निजी संदेशों में ऐसा नहीं है। उन्होंने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य बढ़ोतरी पर चिंता जताई और कहा कि दूसरा युद्ध सबके लिए बुरा होगा। अगर ईरान को अस्तित्व का खतरा लगा, तो ईरान जवाब देगा। ईरान ने क्षेत्रीय देशों से बात की है और सब युद्ध के खिलाफ हैं। ईरान को लगता है कि इजराइल इस वार्ता को तोड़ना चाहता है। समझौते को लेकर तख्त-रवांची ने कहा कि ईरान जेनेवा में उम्मीद के साथ जाएगा और दोनों पक्षों को ईमानदारी दिखानी होगी। क्षेत्र में तैनात किए जा रहे 40,000 से अधिक अमेरिकी सैनिकों के बारे में पूछे जाने पर, तख्त-रावंची ने जवाब दिया, ‘ऐसी स्थिति में खेल अलग होगा।’ ईरान से तनाव के बीच मिडिल ईस्ट में तैनाती बढ़ा रहा अमेरिका अमेरिका मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। अमेरिका अब अपना सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर USS जेराल्ड आर. फोर्ड वहां भेज रहा है। यह एक न्यूक्लियर-पावर्ड कैरियर एयरक्राफ्ट है। रॉयटर्स को दो अमेरिकी अधिकारियों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ रहा है। अधिकारी के मुताबिक, जेराल्ड को मिडिल ईस्ट पहुंचने में एक हफ्ता लगेगा। वहां पहले से अब्राहम लिंकन कैरियर और दूसरे युद्धपोत तैनात हैं। जेराल्ड अपने साथी जहाजों के साथ कैरिबियन सागर में तैनात था। यह इस साल वेनेजुएला में हुए अमेरिकी अभियानों में हिस्सा ले चुका है। इसके अलावा हाल के हफ्तों में कई गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर, फाइटर जेट और निगरानी विमान भी मिडिल ईस्ट में भेजे गए हैं। USS जेराल्ड आर. फोर्ड को जानिए…
https://www.bhaskar.com/international/news/iran-nuclear-talks-trump-indirect-participation-geneva-137227069.html
भारत-US ट्रेड डील में बदलाव, लिस्ट से दाल को हटाया:इंडिया के लिए 500 अरब डॉलर की खरीद भी जरूरी नहीं
अमेरिका ने भारत के साथ हुई हालिया ट्रेड डील पर जारी अपनी फैक्ट शीट में कई बड़े बदलाव किए हैं। पहले जिन बातों का साफ जिक्र था, अब उन्हें या तो हटा दिया गया है या उनकी भाषा बदली गई है। पिछले हफ्ते दोनों देशों ने ट्रेड डील का ऐलान किया था। इसके बाद व्हाइट हाउस ने एक फैक्ट शीट जारी कर आगे की रूपरेखा बताई थी। लेकिन अब उसी दस्तावेज का नया वर्जन जारी हुआ है। सबसे बड़ा बदलाव दाल को लेकर है। पहले कहा गया था कि भारत अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम या खत्म करेगा, जिसमें दाल भी शामिल थी। अब नए दस्तावेज से दाल का जिक्र हटा लिया गया है। 500 अरब डॉलर की खरीद को लेकर भी भाषा बदली गई है। पहले लिखा था कि भारत, अमेरिका से 500 अरब डॉलर का सामान खरीदने के लिए 'कमिटेड' है। अब इसे बदलकर 'इरादा रखता है' कर दिया गया है। डिजिटल सर्विस टैरिफ पर भी अमेरिका के रुख में नरमी नए दस्तावेज में सिर्फ एनर्जी, सूचना और संचार तकनीक, कोयला और कुछ अन्य सामान की बात कही गई है। डिजिटल सर्विस टैरिफ पर भी अमेरिका ने नरमी दिखाई है। पहले कहा गया था कि भारत यह टैरिफ हटाएगा। अब सिर्फ इतना लिखा है कि भारत डिजिटल ट्रेड के नियमों पर बातचीत के लिए तैयार है। अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल इम्पोर्ट के कारण पेनल्टी के रूप में लगाए गए 25% टैरिफ को वापस करने का भी फैसला लिया है। इस फैसले से भारतीय कारोबारियों को ₹40 हजार करोड़ की राहत मिलने की उम्मीद है। व्हाइट हाउस आधिकारिक जानकारी के मुताबिक 27 अगस्त 2025 से लेकर 6 फरवरी 2026 के बीच अमेरिका द्वारा किए गए जिन इम्पोर्ट पर यह पेनल्टी लगी थी, उनका रिफंड दिया जाएगा।
https://www.bhaskar.com/international/news/india-us-trade-deal-500-billion-dollar-purchase-dal-removed-137176619.html
कनाडा के स्कूल में गोलीबारी, शूटर समेत 9 की मौत:10 से ज्यादा घायल, स्कूल में कुल 175 स्टूडेंट पढ़ते हैं
कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के उत्तर-पूर्वी हिस्से में एक हाई स्कूल में मंगलवार को जोरदार गोलीबारी हुई। पुलिस के मुताबिक इस घटना में अब तक कम से कम 9 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 10 से ज्यादा लोग घायल बताए जा रहे हैं। पीस रिवर साउथ स्कूल प्रशासन ने तुरंत सेकेंडरी स्कूल और टम्बलर रिज एलीमेंट्री स्कूल को एहतियातन बंद कर दिया। सभी बच्चों और स्टाफ को स्कूल के अंदर ही सुरक्षित रखा गया। इलाके के विधायक लैरी न्यूफेल्ड ने बताया कि हालात को काबू में करने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस और एंबुलेंस की टीमें मौके पर भेजी गईं। उन्होंने कहा कि फिलहाल ज्यादा जानकारी साझा नहीं की जा सकती, क्योंकि ऑपरेशन अभी जारी है और सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि जो लोग अपने परिवार वालों को ढूंढने के लिए बाहर निकल आए हैं, वे अपने घर लौट जाएं और वहीं सुरक्षित रहें, ताकि पुलिस अपना काम ठीक से कर सके। सरकारी वेबसाइट के मुताबिक, टम्बलर रिज सेकेंडरी स्कूल में कक्षा 7 से 12 तक कुल 175 छात्र पढ़ते हैं। रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) के नॉर्थ डिस्ट्रिक्ट कमांडर केन फ्लॉयड ने कहा कि हालात तेजी से बदल रहे थे और स्थिति काफी गंभीर थी। उन्होंने बताया कि स्कूल प्रशासन, इमरजेंसी टीमों और स्थानीय लोगों के सहयोग से पुलिस को कार्रवाई करने में मदद मिली। पुलिस के अनुसार, दोपहर करीब 1 बजकर 20 मिनट पर स्कूल में गोलीबारी की सूचना मिली थी। सूचना मिलते ही पुलिस स्कूल के अंदर दाखिल हुई। वहां कई लोग घायल और मृत हालत में मिले। एक व्यक्ति जिसे हमलावर माना जा रहा है वो भी मृत पाया गया। उसके शरीर पर खुद को चोट पहुंचाने के निशान मिले हैं। हमलावर के अलावा छह और लोग स्कूल के अंदर मृत मिले। दो घायलों को गंभीर हालत में हेलीकॉप्टर से अस्पताल भेजा गया। एक अन्य व्यक्ति की अस्पताल ले जाते समय रास्ते में मौत हो गई। करीब 25 लोगों को हल्की चोटों के साथ स्थानीय मेडिकल सेंटर में इलाज के लिए ले जाया गया। पुलिस ने बताया कि स्कूल के बाकी सभी छात्रों और स्टाफ को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है। पूरे इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और मामले की जांच जारी है।
इस खबर को अपडेट किया जा रहा है…
https://www.bhaskar.com/international/news/canada-school-shooting-suspect-killed-seven-dead-137176148.html
दक्षिण एशिया में ‘फोर नेशन कार्ड’:पाकिस्तान का नया पैंतरा; बांग्लादेश, चीन और म्यांमार के साथ नई धुरी बनाने की कोशिश
बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से पहले पाकिस्तान और चीन ने ‘फोर नेशन कार्ड’ खेला है। दोनों देश बांग्लादेश और म्यांमार को साथ जोड़कर चार देशों का एक क्षेत्रीय फोरम बनाना चाहते हैं, जिसे दक्षिण एशिया में नए ‘पावर ब्लॉक’ की दिशा में कदम माना जा रहा है। पाकिस्तान चुनाव से पहले इसकी पहली बैठक चाहता है। चीन ने पहले पाक व बांग्लादेश के साथ त्रिपक्षीय फोरम की कोशिश की थी, पर ढाका की उदासीनता के कारण वह योजना सफल नहीं हो सकी। अब पाकिस्तान ने म्यांमार को जोड़कर नया प्रस्ताव रखा है। बांग्लादेश ने इस पर सकारात्मक संकेत दिए हैं। हालांकि चुनाव के चलते अंतरिम सरकार किसी उच्चस्तरीय बैठक के लिए तैयार नहीं है। विदेश मामलों के सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन ने कहा, ‘हमने उन्हें बताया है कि इस पर बैठक नई सरकार के गठन के बाद ही हो सकती है।’ बांग्लादेश फूंक-फूंक कर रख रहा हर कदम, जल्दबाजी में फैसला नहीं फिलहाल बांग्लादेश ने संकेत दिया है कि इस प्रस्ताव पर कोई भी फैसला नई सरकार के गठन के बाद ही लिया जाएगा। वहीं, पाकिस्तान चाहता है कि चुनाव से पहले ही बैठक हो जाए। यह फोरम आगे बढ़ेगा या नहीं, यह बांग्लादेश के चुनाव बाद के रुख और क्षेत्रीय हालात पर निर्भर करेगा। एक राजनयिक के शब्दों में, ‘ढाका की सक्रिय भागीदारी के बिना न तो त्रिपक्षीय और न ही चार पक्षों का फोरम आगे बढ़ सकता है।’ प्रस्ताव भारत के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश 2024 में अवामी लीग सरकार के पतन के बाद पाकिस्तान ने बांग्लादेश में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिशें तेज कर दी हैं। दूसरी ओर, चीन ने भी पिछले 18 महीने में बांग्लादेश में अपनी कूटनीतिक और कारोबारी स्थिति मजबूत की है। विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रस्ताव इस क्षेत्र में भारत के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश है। हालांकि बांग्लादेश की सतर्कता यह दिखाती है कि वह घरेलू राजनीतिक हालात को ध्यान में रखकर ही कोई फैसला लेना चाहता है। पाकिस्तान रोहिंग्या का मुद्दा सुलझाने का लालच भी दे चुका जनवरी में पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने बांग्लादेश के विदेश सलाहकार से कई बार बातचीत की। 24 जनवरी को दोनों के बीच 15 मिनट से ज्यादा बातचीत हुई, जो म्यांमार के विदेश मंत्री की इस्लामाबाद यात्रा से दो दिन पहले हुई थी। डार ने म्यांमार यात्रा के दौरान रोहिंग्या मुद्दे को उठाने पर भी ढाका की राय मांगी थी। इस पर हुसैन ने पाकिस्तान से इस संकट के समाधान में रचनात्मक भूमिका निभाने को कहा था। चीन 3 साल से कर रहा नया फोरम बनाने की कोशिश चीन लंबे समय से बांग्लादेश को क्षेत्रीय फोरम में शामिल करना चाहता है। जून 2023 में चीन और पाकिस्तान ने कुनमिंग में एक अनौपचारिक बैठक की थी, बांग्लादेश ने यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि बिना चौथे देश (जैसे श्रीलंका या नेपाल) के यह फोरम संतुलित नहीं होगा। इसके बाद भी ढाका और कुआलालंपुर में कई प्रयास हुए, लेकिन त्रिपक्षीय योजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब पाकिस्तान ने इसे आगे बढ़ाया है।
https://www.bhaskar.com/g/international/news/the-four-nation-card-in-south-asia-pakistan-china-bangladesh-myanmar-137153219.html
दलाई लामा ऑफिस ने एपस्टीन फाइल्स से संबंध नकारा:सोशल मीडिया पर आई खबरों पर दी सफाई, कहा- कभी नहीं मिले
दुनिया के चर्चित 'एपस्टीन फाइल्स' सेक्स स्कैंडल से अब बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा का नाम भी जोड़ा जा रहा है। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दलाई लामा को अमेरिकी अपराधी जेफ्री एपस्टीन से संबंधित बताया जा रहा था। इन दावों पर दलाई लामा के कार्यालय ने आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्टीकरण दिया है। दलाई लामा के कार्यालय ने इन खबरों को पूरी तरह से असत्य बताया है। जारी प्रेस स्टेटमेंट में कहा गया, "हम पूरी स्पष्टता के साथ पुष्टि करते हैं कि परम पावन दलाई लामा ने कभी भी जेफ्री एपस्टीन से मुलाकात नहीं की है। न ही उन्होंने अपनी ओर से किसी को एपस्टीन से मिलने या बातचीत करने के लिए अधिकृत किया था।" अमेरिकी राष्ट्रपतियों सहित कई बड़ी हस्तियों के नाम हाल ही में न्यूयॉर्क की एक अदालत ने एपस्टीन से जुड़े सैकड़ों पन्नों के अदालती दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं। इन दस्तावेजों में उन लोगों के नाम दर्ज हैं, जिन्हें एपस्टीन के निजी द्वीप, उसके प्लेन ('लोलिता एक्सप्रेस') या उसके घर पर देखा गया था। इन फाइलों में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, डोनाल्ड ट्रंप, प्रिंस एंड्रयू और स्टीफन हॉकिंग जैसे कई प्रमुख व्यक्तियों के नाम सामने आए हैं। हालांकि, यह स्पष्ट किया गया है कि किसी का नाम फाइलों में होने का मतलब यह नहीं है कि वह किसी अपराध में शामिल था। तश्वीरों को छेड़छाड़ कर आया था नाम दलाई लामा का नाम सोशल मीडिया पर वायरल हो रही कुछ 'मॉर्फ्ड' (छेड़छाड़ की गई) तस्वीरों और फर्जी सूचियों के माध्यम से सामने आया है। दलाई लामा कार्यालय ने इसे उनकी छवि खराब करने की एक सुनियोजित साजिश बताया है। दलाई लामा की टीम ने साफ कर दिया है कि धर्मगुरु का इस विवादित मामले से कोई संबंध नहीं है और ये खबरें पूरी तरह से फर्जी हैं।
कौन था जेफ्री एपस्टीन? एपस्टीन अमेरिका का एक रसूखदार और अरबपति फाइनेंसियर था, जिस पर कम उम्र की लड़कियों की तस्करी (Sex Trafficking) और शोषण का आरोप था। 2019 में जेल में उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी।
https://www.bhaskar.com/local/himachal/kangra/dharamshala/news/dalai-lama-office-denies-epstein-files-link-137152512.html
लीबिया के पूर्व तानाशाह गद्दाफी के बेटे की हत्या:घर में घुसकर गोली मारी; चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे
लीबिया के पूर्व तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी के बेटे सैफ अल-इस्लाम गद्दाफी की मंगलवार को गोली मारकर हत्या कर दी गई। लीबियाई न्यूज चैनल फवासेल के मुताबिक जिंटान शहर में उनके घर पर चार हमलावरों ने हमला किया और उन्हें मार डाला। सैफ अल-इस्लाम गद्दाफी के वकील खालिद अल-जैदी और राजनीतिक सलाहकार अब्दुल्ला ओथमान ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए उनकी मौत की जानकारी दी। हालांकि शुरुआती बयानों में हत्या की वजह या हमलावरों की पहचान को लेकर कोई जानकारी नहीं दी गई। हालांकि उनकी मौत को लेकर उनकी बहन ने अलग ही दावा किया है। BBC ने लीबियाई टीवी के हवाले से बताया कि सैफ अल-इस्लाम की मौत लीबिया-अल्जीरिया सीमा के पास हुई। सैफ अल-इस्लाम की उम्र 53 साल थी। सैफ अल-इस्लाम गद्दाफी को कभी अपने पिता का उत्तराधिकारी माना जाता था। मुअम्मर गद्दाफी के राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाते थे सैफ अल-इस्लाम सैफ अल-इस्लाम गद्दाफी को लंबे समय तक अपने पिता मुअम्मर गद्दाफी का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता रहा। उनका जन्म 25 जून 1972 को त्रिपोली में हुआ। गद्दाफी परिवार लीबिया में दशकों तक सत्ता में रहा और सैफ अल-इस्लाम उसी ताकतवर परिवार का सबसे पढ़ा-लिखा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाना-पहचाना चेहरा थे। उन्होंने लीबिया के बाहर भी पढ़ाई की और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से शिक्षा ली। 2000 के दशक में वे खुद को एक सुधारवादी नेता के रूप में पेश करते थे। वे पश्चिमी देशों से रिश्ते सुधारने, अर्थव्यवस्था और कुछ हद तक राजनीतिक बदलाव की बातें करते थे। इसी वजह से कई विदेशी नेता और मीडिया उन्हें गद्दाफी शासन का नरम और आधुनिक चेहरा मानने लगे थे। सैफ ने कभी कोई आधिकारिक पद नहीं संभाला, लेकिन वे लीबिया में अपने पिता के बाद सबसे ताकतवर व्यक्ति थे। 2000 के दशक में उन्होंने लीबिया के पश्चिमी देशों से रिश्ते सुधारने में बड़ी भूमिका निभाई। सैफ अल-इस्लाम को 2015 में मौत की सजा सुनाई गई 2011 में अरब स्प्रिंग (तानाशाही के खिलाफ विरोध प्रदर्शन) के दौरान लीबिया में विद्रोह हुआ, जो गद्दाफी शासन के खिलाफ था। सैफ अल-इस्लाम ने अपने पिता का साथ दिया और विद्रोहियों को कुचलने की कोशिश की। वे टीवी पर आए और लोगों को चेतावनी दी कि विरोध करने वालों को सजा मिलेगी। सैफ अल-इस्लाम विद्रोहियों को 'चूहे' कहकर बुलाते थे और कहते थे कि सरकार आखिरी गोली तक लड़ेगी। उन्होंने कहा था, "हम लीबिया में लड़ेंगे, यहीं मरेंगे।" क्रांति के दौरान उनके पिता मारे गए और सैफ अल-इस्लाम भागने की कोशिश में पकड़े गए। नवंबर 2011 में उन्हें जिंटान शहर के मिलिशिया ने गिरफ्तार कर लिया। 2015 में लीबियन कोर्ट ने उन्हें मौत की सजा सुनाई (उन्हें कोर्ट में पेश किए बिना)। 2017 में माफी के बाद रिहा हुए थे अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) ने उन पर युद्ध अपराधों के आरोप लगाए। उन पर आरोप लगे कि उन्होंने अपने पिता की सरकार के साथ मिलकर आम नागरिकों के खिलाफ हिंसा और दमन में भूमिका निभाई। सैफ को 2017 तक जिंटान में कैद रखा गया। हालांकि, 2017 में एक आम माफी के तहत उन्हें रिहा कर दिया गया। रिहाई के बाद कई साल तक सैफ अल-इस्लाम सार्वजनिक रूप से बहुत कम दिखाई दिए और उनकी स्थिति रहस्यमय बनी रही। वे राजनीति में वापसी की कोशिश कर रहे थे। 2021 में राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवारी घोषित की थी सैफ ने 2021 में उन्होंने लीबिया के राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवारी घोषित की, जो काफी विवादास्पद थी। कई लोग उन्हें गद्दाफी शासन के अपराधों के लिए जिम्मेदार मानते थे, इसलिए चुनाव टल गया। वे पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ लीबिया (PFLL) पार्टी से जुड़े थे। इलेक्शन कमीशन ने पहले उनकी कैंडिडेसी रिजेक्ट कर दी। कमीशन ने कहा कि क्रिमिनल रिकॉर्ड की वजह से वो चुनाव नहीं लड़ सकते। सैफ ने इसके खिलाफ कोर्ट में अपील की। कोर्ट ने दिसंबर 2021 में फैसला दिया कि वो कैंडिडेट रह सकते हैं। उनकी कैंडिडेसी बहाल कर दी गई। लेकिन लीबिया की पॉलिटिक्स इतनी उलझी हुई थी कि चुनाव ही नहीं हो पाया।
https://www.bhaskar.com/g/international/news/libya-gaddafi-son-saif-al-islam-shot-dead-137119799.html
दावा- ईरान में प्रदर्शनकारी महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ:गर्भाशय निकाले, सिर की खाल नोंची गई; सबूत छिपाने के लिए शव जलाए
ईरानी-जर्मन पत्रकार मिशेल अब्दोल्लाही ने ईरानी सरकार पर चौंकाने वाले आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि ईरानी सुरक्षा बलों ने विरोध करने वाली महिलाओं के खिलाफ बलात्कार और म्यूटिलेशन (विकलांग करना) को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया ताकि वह लोगों में ज्यादा से ज्यादा डर पैदा कर सके और संघर्ष रुक जाए। डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, अब्दोल्लाही ने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर दावा किया कि उन्हें प्रत्यक्षदर्शियों से जानकारी मिली है। उनके अनुसार, गिरफ्तार महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाता है, उनके गर्भाशय निकाल दिए जाते हैं, सिर की खाल उनके बालों सहित उतार दी जाती है और शरीर पर सिगरेट के जलने के निशान छोड़ दिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं के शव बहुत कम या बिल्कुल नहीं लौटाए जाते क्योंकि शासन उन्हें पहले जला देता है ताकि यातना के निशान छिप जाएं। अब्दोल्लाही ने आरोप लगाया कि ईरान का इस्लामिक गणराज्य, खामेनेई के नेतृत्व में अपने लोगों के खिलाफ बलात्कार को हथियार बनाता है। यहां तक कि बच्चों के साथ भी ऐसी ही हिंसा की जा रही है। गिरफ्तार किए गए प्रदर्शनकारियों को जबरन नग्न किया, इंजेक्शन दिए जर्मन अखबार डाई वेल्ट ने भी प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से ऐसी ही घटनाओं की रिपोर्ट की है। एक गवाह ने बताया कि अधिकारियों ने घायल महिलाओं को कूड़े के ढेर की तरह गाड़ियों में लोड किया और कहा, "हम तुम्हें अभी नहीं मारेंगे। पहले बलात्कार करेंगे, फिर मारेंगे।" इसके अलावा, ईरान में हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को जबरन नग्न किया गया और अज्ञात पदार्थों के इंजेक्शन दिए गए। द गार्जियन अखबार ने भी केरमानशाह शहर में 16 साल की एक लड़की सहित कई प्रदर्शनकारियों के साथ यौन उत्पीड़न की घटना रिपोर्ट की, जहां सुरक्षा बलों ने डंडो से उनके शरीर को गलत तरीके से छुआ और बुरी तरह पीटा। ईरान में महिलाओं ने हिजाब उतार विरोध जताया था ईरान में 28 दिसंबर से शुरू हुई हिंसा 15 जनवरी तक चली थी। ये प्रदर्शन अब तक के सबसे बड़े प्रदर्शनों में से एक माने जा रहे हैं। इनमें 5000 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी। यह हिंसा महंगाई के खिलाफ भड़की थी। ईरानी मुद्रा रियाल की कीमत इतिहास में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया था। 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत लगभग 1,455,000 से 1,457,000 रियाल (ओपन मार्केट रेट) हो गई। चाय, ब्रेड जैसी रोजमर्रा की चीजें भी बहुत महंगी हो गईं। कई लोग पुरानी राजशाही (शाह का शासन) वापस लाने की मांग कर रहे थे। इस दौरान महिलाओं ने हिजाब न पहनने, मोटरसाइकिल चलाने, खामेनेई की तस्वीरों को जलाकर और सिगरेट जलाने जैसी हरकतों से विरोध जताया था। रिपोर्ट- ईरान में लगभग 5000 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई थी प्रदर्शनों को कुचलने के लिए ईरान में 8 जनवरी से इंटरनेट और अंतरराष्ट्रीय संचार बंद कर दिया गया था। मिलिशिया और यहां तक कि इराक से 5,000 शिया लड़ाकों को भी तैनात किया गया। सरकार और ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स एजेंसियों ने मौत का आंकड़ा भी अलग-अलग बताया। ईरान की सरकारी एजेंसी ने 3,117 मौतें बताईं, जिनमें से ज्यादातर सुरक्षा बलों या निर्दोष लोगों की बताई गईं। रॉयटर्स ने एक ईरानी अधिकारी के हवाले से 5,000 मौतें रिपोर्ट की। जबकि अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स इन ईरान ने 3,308 मौतों का अनुमान लगाया। दूसरे रिपोर्टों में मौतों की संख्या 2,000 से 6,000 तक बताई गई है। हालांकि ईरान से जुड़े मामलों को कवर करने वाली वेबसाइट ईरान इंटरनेशनल ने दावा किया कि देशभर में कम से कम 12 हजार लोगों की मौत हुई है। ज्यादातर लोग गोली लगने से मारे गए हैं। हिजाब ठीक से नहीं पहनने पर महसा अमीनी के साथ रेप किया गया था ईरान में साल 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद भड़के प्रदर्शनों को दबाने के लिए भी सुरक्षा बलों ने महिलाओं के साथ यौन हिंसा, रेप और अत्याचार किए थे। एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट्स में महिलाओं और पुरुषों दोनों के साथ रेप, यौन उत्पीड़न और टॉर्चर की पुष्टि हुई थी। सितंबर 2022 में 22 साल की कुर्द-ईरानी महिला महसा अमीनी अपने भाई के साथ तेहरान घूमने आई थीं। 13 सितंबर को ईरान की पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया क्योंकि उनका हिजाब ठीक से नहीं पहना गया था। पुलिस ने उन्हें एक डिटेंशन सेंटर में ले जाकर रखा, जहां महिलाओं को हिजाब के नियम सिखाए जाते हैं। वहां कुछ ही मिनटों बाद महसा बेहोश हो गईं। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां वे कोमा में चली गईं और 16 सितंबर 2022 को उनकी मौत हो गई। ईरानी सरकार का दावा है कि महसा को हार्ट अटैक हुआ था और उनकी मौत पहले से मौजूद बीमारी की वजह से हुई। हालांकि, उनके परिवार और कई प्रत्यक्षदर्शियों ने कहा कि पुलिस ने उनके साथ मार-पीट की। संयुक्त राष्ट्र की जांच ने 2024 में कहा कि महसा अमीनी की मौत शारीरिक हिंसा के कारण हुई। ईरान में महिलाओं को जबरन प्रदर्शनकारी बना कपड़े उतरवाए गए थे इस मौत के बाद ईरान भर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जो महीनों तक चले। लोग सड़कों पर उतरे, खासकर महिलाएं हिजाब उतारकर बाल खोलकर विरोध जता रही थीं। प्रदर्शनों में सैकड़ों लोग मारे गए, हजारों गिरफ्तार हुए, और कई को फांसी दी गई। यह 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में सबसे बड़ा विरोध आंदोलन था, जो सिर्फ हिजाब से शुरू होकर पूरे शासन के खिलाफ हो गया। इस दौरान गिलान प्रांत की 25 साल की डोर्सा (नाम बदला हुआ) अपनी बहन और दो पुरुष दोस्तों के साथ कार में थीं। चेकपॉइंट पर सुरक्षा बलों ने उन्हें रोका। बहन के बैग में स्प्रे पेंट मिलने पर दोनों बहनों को आंखों पर पट्टी बांधकर, हाथ पीछे बांधकर ले जाया गया। उन्हें जबरन विरोध करने का कबूलनामा साइन करवाया गया। डोर्सा को अलग कमरे में ले जाकर बुरी तरह पीटा गया, गालियां दी गईं। कपड़े उतरवाकर एक पुरुष (जिसे डॉक्टर बताया गया) ने उनके शरीर पर हाथ फेरा। दर्द और सदमे से वह बेहोश हो गईं। रात में उन्हें शहर से दूर छोड़ दिया गया। घर पहुंचकर डॉक्टर ने बताया कि उनके साथ बलात्कार हुआ था। ईरान में महिलाओं का बिना हिजाब घूमना गैरकानूनी ईरान में महिलाओं की आजादी को लेकर कई कानून बनाए गए हैं। जो 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद लागू हुए। हिजाब और ड्रेस कोड: विवाह और तलाक: लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 13 साल है। पुरुष को एक से ज्यादा शादी का अधिकार है। महिलाएं आसानी से तलाक नहीं ले पाती। बच्चों की कस्टडी: तलाक के बाद छोटे बच्चों की कस्टडी मां को, लेकिन बड़े होने पर पिता को मिलती है। नागरिकता: ईरानी महिला से शादी करने वाला विदेशी पुरुष ईरानी नागरिकता नहीं पाता और बच्चे को भी मां से नागरिकता नहीं मिलती (पिता से मिलती है)। यात्रा: महिलाओं को अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए पति/पिता की अनुमति जरूरी (कुछ अपवादों को छोड़कर)। गवाही: अदालत में एक महिला की गवाही आधी मानी जाती है (पुरुष की तुलना में)।
---------------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… ईरानी प्रदर्शनकारी बोले- ट्रम्प ने हमें धोखा दिया: सबसे ज्यादा जरूरत के वक्त समर्थन नहीं किया; हिंसा में अब तक 5000 लोगों की मौत ईरान में प्रदर्शनकारियों ने कहा कि उन्हें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से उम्मीद थी कि वे उनके लिए मददगार साबित होंगे। लेकिन अब ट्रम्प के रुख में बदलाव आ गया है, इससे वह अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि ट्रम्प ने जो कहा और बाद में जो किया, उनके बीच बहुत बड़ा फर्क था। पूरी खबर पढ़ें…
https://www.bhaskar.com/g/international/news/iran-protest-women-brutality-rape-mutilation-journalist-claims-137111076.html
वर्ल्ड अपडेट्स:भारत में अमेरिकी दूतावास का सोशल मीडिया रोज से अपडेट नहीं किया जाएगा, शटडाउन कारण बताया
भारत में अमेरिकी दूतावास ने शनिवार को संयुक्त राज्य अमेरिका में चल रहे आंशिक सरकारी शटडाउन के कारण अपनी सोशल मीडिया गतिविधि में अस्थायी कमी की घोषणा की। इसमें कहा गया कि जब तक पूरा कामकाज फिर से शुरू नहीं हो जाता, तब तक उसका आधिकारिक X अकाउंट नियमित रूप से अपडेट नहीं किया जाएगा। X पर एक पोस्ट में, दूतावास ने कहा कि सुरक्षा और जरूरी चीजों पर अपडेट सहित जरूरी कम्यूनिकेशन होता रहेगा। पोस्ट में लिखा गया, फंड की कमी के कारण, यह X अकाउंट तब तक नियमित रूप से अपडेट नहीं किया जाएगा जब तक कि पूरा कामकाज फिर से शुरू नहीं हो जाता, सिवाय जरूरी सुरक्षा और संरक्षा जानकारी के। ढाका में अमेरिकी दूतावास ने भी आंशिक सरकारी शटडाउन के बीच इसी तरह का बयान जारी किया।
https://www.bhaskar.com/international/news/breaking-news-live-updates-headlines-1-february-137093429.html
पाकिस्तानी PM बोले- कर्ज मांगने में अब शर्म आती है:दूसरे देशों के सामने हमारा सिर झुका रहता है, उनकी शर्तें मानना हमारी मजबूरी
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज ने विदेशी कर्ज पर देश की बढ़ती निर्भरता को लेकर खुलकर नाराजगी जताई है। न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक शहबाज ने राजधानी इस्लामाबाद में कारोबारी नेताओं को संबोधित करते हुए माना कि देश की बदहाल आर्थिक स्थिति के कारण उन्हें उन्हें बार‑बार विदेशी दौरों पर जाकर कर्ज मांगना पड़ा। उन्होंने कहा, “मैं बगैर के लाग-लेपट के आपको बताना चाहता हूं कि जब फील्ड मार्शल असीम मुनीर और मैं दुनियाभर में पैसे मांगने जाते हैं तो हमें शर्म आती है। कर्ज लेना हमारे आत्मसम्मान पर बहुत बड़ा बोझ है। कई बार हमें कॉम्प्रोमाइज करना पड़ता है। कई बार हम उनकी शर्तों को ‘ना’ भी नहीं कह पाते।” शहबाज बोले- पाकिस्तान को अब दूसरे रास्ते तलाशने की जरूरत शहबाज ने यह भी कहा कि कर्ज का बोझ देश की इज्जत पर भारी पड़ रहा है और अब वैकल्पिक आर्थिक रास्ते तलाशने की जरूरत है। उनका बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान IMF से मदद और पुराने कर्ज को रोलओवर (आगे बढ़ाने) की कोशिश कर रहा है। पीएम शहबाज के बयान से जाहिर है कि पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है और अंतरराष्ट्रीय मदद पर बहुत ज्यादा निर्भर हो चुका है। शहबाज ने चीन को “हर मौसम का दोस्त” बताया और कहा कि सऊदी अरब, यूएई और कतर ने भी अच्छे-बुरे हर वक्त पाकिस्तान का साथ दिया है।
https://www.bhaskar.com/international/news/pakistan-debt-crisis-shehbaz-sharif-islamabad-speech-asim-munir-137086241.html
अमेरिका में सस्ती दवाओं के लिए वेबसाइट लॉन्च करेंगे ट्रम्प:800% तक खर्च कम होगा; 16 कंपनियों से समझौता, बदले में 3 साल का टैरिफ छूट दिया
ट्रम्प प्रशासन इस महीने 'ट्रम्प Rx' नाम की एक नई सरकारी वेबसाइट लॉन्च करने जा रहा है। इस प्लेटफॉर्म के जरिए मरीज दवा कंपनियों से सीधे कम दामों पर दवाएं खरीद सकेंगे। प्रशासन का दावा है कि इस पहल से अमेरिकी लोगों के दवा खर्च को 800% तक कम किया जाएगा। अमेरिकी रेडियो NPR की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प प्रशासन ने पिछले साल सितंबर से अब तक16 बड़ी दवा कंपनियों के साथ समझौते किए हैं। इन समझौतों को "मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN)" डील्स कहा गया। बदले में दवा कंपनियों को 3 साल तक इम्पोर्टेड दवाओं पर टैरिफ से छूट मिलेगी। यह योजना चुनावी वादों और “अमेरिका फर्स्ट” हेल्थ पॉलिसी से जुड़ी मानी जा रही है। ट्रम्प का कहना है कि दूसरे अमीर देश अमेरिका में बनी दवाइयां कम कीमत पर खरीदते हैं, जबकि अमेरिकियों को इसके लिए तीन गुना ज्यादा चुकाना पड़ता है। यह प्रोग्राम सुनिश्चित करेगा कि दवा कंपनियां उसी दाम पर दवा बेचे जो बाकी देशों में मिल रही है। अमेरिकी कंपनियां को कम कीमतों पर दवा बेचना होगा अमेरिकी कंपनियां दवाओं के रिसर्च, टेस्टिंग, फैक्ट्री करोड़ों-खरबों रुपये खर्च करती है। दुनिया भर में यह दवा बेची जाती है। अमेरिका में यह दवा बहुत महंगी है, जबकि यूरोप, कनाडा, जापान जैसे अमीर देशों में वही दवा बहुत सस्ती मिलती है। दरअसल, उन देशों की सरकार कम कीमत पर दवा खरीदने की मांग करती है और ऐसा न करने पर डील रोकने का खतरा रहता है। कंपनी को डर लगता है कि बाजार खो न जाए, इसलिए वहां कम कीमत दे देती है। ट्रम्प का मानना है कि अमेरिकी लोग ही दुनिया की ज्यादातर कमाई का बड़ा हिस्सा देते हैं, जिससे नई दवाएं बनती हैं। विदेशी देश कम पैसा देकर इसका फायदा उठाते हैं। ट्रम्प के मुताबिक वह अमेरिका की मेहनत पर 'फ्री राइड' करते हैं। इसलिए इस MFN प्रोग्राम में फैसला किया गया है कि अब अमेरिका में भी दवा की कीमत सबसे कम होगी जो किसी अमीर देश में मिलती है। कंपनियों से कहा गया कि अमेरिका को भी वही सस्ती डील दो। इससे विदेशी देशों को भी ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी, जैसे ब्रिटेन के साथ हुए समझौते में नई दवाओं की कीमत 25% बढ़ाई गई है। अमेरिकी मरीजों को दवाएं सस्ती मिलेंगी, कंपनियों का एक्स्ट्रा पैसा अमेरिका वापस आएगा और देश में दवा बनाने का काम बढ़ेगा। दवा कंपनियां ट्रम्पRx से क्यों डरी हुई हैं वेबसाइट की लॉन्च इवेंट पोस्टपोन हुई रिपोर्ट्स के अनुसार 30 जनवरी 2026 को एक लॉन्च इवेंट रखा गया था। लेकिन अब इस इवेंट को पोस्टपोन कर दिया गया है। वेबसाइट पर अभी भी ‘जल्द आएगा’ लिखा दिख रहा है। योजना के तकनीकी और कानूनी पहलुओं पर अभी पूरी सहमति नहीं बनी है। दवा कंपनियों, बीमा सेक्टर और राज्यों की तरफ से कई आपत्तियां सामने आई हैं। हालांकि, सरकार भी नहीं चाहती कि आधी-अधूरी तैयारी के साथ योजना लॉन्च हो। इसी वजह से व्हाइट हाउस ने TrumpRx के लॉन्च इवेंट को अभी पोस्टपोन कर दिया। योजना रद्द नहीं हुई है। जॉनसन एंड जॉनसन जैसी कंपनियों के साथ समझौते की तैयारी ट्रम्प ने दावा किया कि यह अमेरिकी स्वास्थ्य सेवा में मरीजों के लिए अब तक की सबसे बड़ी जीत है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर अमेरिकियों की जेब पर कोई असर नहीं पड़ेगा। कई लोग इंश्योरेंस से पहले से ही कम पैसे में दवाएं ले रहे हैं। ट्रम्प ने पहले कई बार दवा भारी टैरिफ की धमकी दी थी, लेकिन अब तक ऐसा नहीं किया। अभी अब्बवी, जॉनसन एंड जॉनसन और रेजेनेरॉन जैसी तीन बड़ी कंपनियां समझौते से बाहर हैं और बातचीत जारी है। ट्रम्प ने कहा कि जल्द ही जॉनसन एंड जॉनसन समेत कुछ और कंपनियां कीमत कम करने का ऐलान करेंगी। पुरानी बीमारी से जूझ रहे मरीजों को फायदा होगा इस प्रोग्राम से उन अमेरिकी मरीजों को फायदा होगा जो पुरानी और खर्चीली बीमारियों जैसे टाइप 2 डायबिटीज, गठिया, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, दमा, COPD, हेपेटाइटिस B और C, HIV, कैंसर और हृदय रोगों से पीड़ित हैं। मेडिकेड और मेडिकेयर लाभार्थी सीधे MFN कीमतों का लाभ उठा सकेंगे। इससे राज्य मेडिकेड प्रोग्रामों में अरबों डॉलर की बचत होगी और कमजोर वर्ग को बेहतर सहायता मिलेगी। TrumpRx.gov के जरिए बिना इंश्योरेंस वाले या कैश पेइंग मरीज सस्ती दवाएं खरीद सकेंगे। इसके अलावा, GLP-1 दवाओं जैसे ओजेम्पिक (टाइप 2 डायबिटीज के लिए दिया जाने वाला इंजेक्शन) और वेगोवी (मोटापा कम करने के लिए) के यूजर्स को भी लाभ मिलेगा, जहां कीमतें $1000 से घटकर $350 हो गई हैं। यह प्रोग्राम अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करेगा। 8 करोड़ से ज्यादा लोगों को मेडिकल सुविधाएं देता अमेरिका अमेरिका में गरीब या कम आय वाले लोगों को मेडिकेड नाम का सरकारी प्रोग्राम मेडिकल फैसिलिटी और हेल्थकेयर प्रदान करता है। यह एक जॉइंट फेडरल और स्टेट प्रोग्राम है जो फ्री या बहुत कम खर्च वाली हेल्थ कवरेज देता है। यह बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, डिसेबल्ड लोगों, और कम आय वाले परिवारों को कवर करता है। 2026 में यह करीब 8 करोड़ से ज्यादा लोगों को कवर कर रहा है, जिसमें से ज्यादातर गरीब परिवार हैं। मेडिकेड में अस्पताल में भर्ती, डॉक्टर के पास जाना, दवाइयां, लैब टेस्ट, प्रेग्नेंसी केयर, बच्चों की वैक्सीनेशन, और लॉन्ग-टर्म केयर जैसी सेवाएं शामिल होती हैं। कई मामलों में यह पूरी तरह फ्री होती है, या बहुत कम को-पेमेंट होता है। ------------------------ ये खबर भी पढ़ें…. अमेरिका में जन्मे बच्चों को ₹92 हजार देंगे ट्रम्प: निवेश में बैंक-टेक कंपनियां भी शामिल; 18 साल के होने पर पढ़ाई-बिजनेस में इस्तेमाल कर सकेंगे अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों को सरकार की ओर से 1,000 डॉलर (92 हजार रुपए) दिए जाएंगे। यह रकम बच्चों के नाम से खोले जाने वाले एक स्पेशल अकाउंट में जमा की जाएगी। यह योजना पिछले साल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शुरू की थी। पूरी खबर पढ़ें…
https://www.bhaskar.com/international/news/trump-launches-website-lower-drug-costs-us-137078343.html
ट्रम्प की 100% टैरिफ धमकी पर कनाडाई पीएम की सफाई:बोले- चीन के करीब नहीं जा रहे; हमारे बीच कोई फ्री-ट्रेड एग्रीमेंट नहीं
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने सोमवार को कहा है कि उनकी सरकार चीन के साथ किसी भी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर काम नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई व्यापार समझौता करने का कोई इरादा भी नहीं है। कार्नी का यह बयान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की कड़ी चेतावनी के एक दिन बाद आया है। ट्रम्प ने कहा था कि अगर कनाडा चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौता करता है तो कनाडाई सामानों पर 100% टैरिफ लगा दिया जाएगा। कार्नी ने कहा, "हम कनाडा-अमेरिका-मेक्सिको समझौता (CUSMA) के तहत हम किसी गैर-बाजार अर्थव्यवस्था वाले देश के साथ मुक्त व्यापार समझौता करने से पहले सूचना देंगे। हमारा चीन या किसी दूसरे ऐसे देश के साथ ऐसा ट्रेड करने का कोई इरादा नहीं है।" ट्रम्प ने कनाडा पर 100% टैरिफ लगाने की धमकी दी थी ट्रम्प ने शनिवार को सोशल मीडिया पर एक के बाद एक पोस्ट में कनाडा को चेतावनी दी थी कि अगर वह चीन के साथ गहरा व्यापार संबंध बढ़ाता है तो गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। ट्रम्प ने कहा कि अगर कार्नी ये सोचते हैं कि वे कनाडा को चीन का ऐसा रास्ता बना देंगे जहां से चीन अपना सामान अमेरिका भेज सके तो वे गलत हैं। ट्रम्प ने कहा कि चीन, कनाडा को पूरी तरह नुकसान पहुंचा देगा। चीन, कनाडा के कारोबार, समाज और जीवनशैली को खत्म कर देगा और देश को पूरी तरह निगल जाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने साफ कहा कि अगर कनाडा ने चीन के साथ कोई समझौता किया, तो अमेरिका तुरंत कनाडा से आने वाले सभी सामानों पर 100% टैरिफ लगा देगा। ट्रम्प ने शुक्रवार को भी कहा था कि चीन, कनाडा को एक साल के अंदर ही खा जाएगा। दरअसल, कनाडा के PM मार्क कार्नी ट्रम्प के 'गोल्डन डोम' मिसाइल प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। ट्रम्प इससे नाराज हो गए हैं। उन्होंने कहा कि कनाडा हमारे बजाय चीन से दोस्ती बढ़ा रहा, जो उन्हें पहले ही साल में बर्बाद कर देगा। कनाडा पर आरोप लगाते हुए ट्रम्प ने कहा कि वह नॉर्थ अमेरिका की सुरक्षा के लिए खतरा है। कनाडा-चीन के व्यापार समझौते से नाराज हुए थे ट्रम्प कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने 13 जनवरी से 17 जनवरी तक चीन की यात्रा की और वहां व्यापार समझौते किए। रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रम्प इससे नाराज बताए जा रहे हैं। करीब एक साल पहले कार्नी खुद चीन को कनाडा के सामने “सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा” बता चुके थे, लेकिन एक साल बाद हालात बदल चुके हैं। चीन दौरे पर उन्होंने कई अहम करार किए हैं। इसमें कनाडा, चीन की इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EV) पर लगाए गए टैरिफ को कम करेगा। कनाडा ने 2024 में अमेरिका के साथ मिलकर चीनी गाड़ियों पर 100% टैरिफ लगाया था। अब नए समझौते के तहत इस टैरिफ को घटाकर 6.1% किया जा रहा है। हालांकि यह हर साल 49 हजार इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर लागू होगा। 5 साल में इसे बढ़ाकर 70 हजार तक किया जा सकता है। इसके बदले में चीन, कनाडा के कुछ अहम कृषि उत्पादों पर लगाए गए जवाबी टैरिफ को घटाएगा। पहले यह टैरिफ 84% तक था, जिसे अब घटाकर 15% कर दिया गया है। साल के अंत तक इसे जीरो किया जा सकता है। कनाडा और अमेरिका के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट अमेरिका और कनाडा एक-दूसरे के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार हैं, जहां हर रोज लगभग 15 हजार करोड़ रुपए के सामान और सेवाओं का आदान-प्रदान होता है। 2024 में, द्विपक्षीय व्यापार का कुल मूल्य लगभग 79 लाख करोड़ रुपए का था, जिसमें अमेरिका का कनाडा के साथ माल व्यापार घाटा 5.21 लाख करोड़ रुपए रहा। USMCA (यूनाइटेड स्टेट्स-मेक्सिको-कनाडा एग्रीमेंट) दोनों देशों के बीच एक अहम समझौता था। यह 2020 में लागू हुआ था। यह समझौता मुक्त व्यापार को बढ़ावा देता है। 2026 में इसकी समीक्षा होनी है। USMCA के तहत सामान (81% आयात) पर छूट होती है। अमेरिका को मिलने वाला कच्चा तेल, गैस और बिजली का बड़ा हिस्सा कनाडा से आता है। इसके अलावा ऑटो पार्ट्स, लकड़ी और कृषि उत्पाद भी अमेरिका में कनाडा से बड़े पैमाने पर जाते हैं। कनाडा अपने कुल निर्यात का बड़ा हिस्सा अमेरिका को भेजता है। मशीनरी, टेक्नोलॉजी, दवाइयां और उपभोक्ता सामान के मामले में कनाडा अमेरिका पर काफी हद तक निर्भर है। ट्रम्प के गोल्डन डोम प्रोजेक्ट का कनाडाई PM ने विरोध किया था ट्रम्प ग्रीनलैंड पर कब्जा कर वहां गोल्डन डोम बनाना चाहते हैं। कार्नी ने ट्रम्प के कब्जे वाली बात का विरोध किया था, इसपर अमेरिकी राष्ट्रपति नाराज हो गए थे। अमेरिका ने इजराइल के आयरन डोम मिसाइल डिफेंस सिस्टम की तर्ज पर अपना डिफेंस सिस्टम गोल्डन डोम बनाने का फैसला किया है। ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के एक हफ्ते बाद ही गोल्डन डोम प्रोजेक्ट का ऐलान किया था। यह प्रोजेक्ट करीब 175 अरब डॉलर (लगभग 14-15 लाख करोड़ रुपए) का है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक गोल्डन डोम मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए 1200 से ज्यादा सैटेलाइट्स लॉन्च करने की योजना बनाई गई है। इसकी मदद से अमेरिका दुश्मन मिसाइलों का अंतरिक्ष में ही पता लगाकर उन्हें नष्ट करने की तैयारी कर रहा है। इनमें 400 से 1000 सैटेलाइट्स दुश्मन मिसाइलों की पहचान और ट्रैकिंग के लिए तैनात किए जाएंगे। वहीं, लगभग 200 इंटरसेप्टर सैटेलाइट्स उन मिसाइलों को अंतरिक्ष में ही मार गिराने के लिए तैयार की जाएंगी। यह डिफेंस सिस्टम दुनिया के किसी भी हिस्से से लॉन्च होने वाली मिसाइलों को रोकने में सक्षम होगा। ट्रम्प ने दावा किया है कि गोल्डन डोम अंतरिक्ष से हुए हमलों को भी रोकने के काबिल होगा। इसमें सर्विलांस सैटेलाइट और इंटरसेप्टर सैटेलाइट दोनों शामिल होंगे। ट्रम्प ने जनवरी में इस प्रोजेक्ट को शुरू किया था। उन्होंने कहा है कि यह सिस्टम 2029 तक काम करने लगेगा। प्रोजेक्ट की कमान अमेरिकी स्पेस फोर्स के वरिष्ठ जनरल माइकल ग्यूटलेन को सौंपी गई है। कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाना चाहते हैं ट्रम्प ट्रम्प कई बार कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात कह चुके हैं। कार्नी ने पिछले साल मई में ट्रम्प से व्हाइट हाउस में मुलाकात की थी। इस दौरान कार्नी ने ट्रम्प से साफ शब्दों में कहा था कि कनाडा बिकाऊ नहीं है। दरअसल, बैठक के दौरान ट्रम्प ने कहा था कि अगर कनाडा अमेरिका में शामिल होता है तो वहां के लोगों को कम टैक्स, बेहतर सुरक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी। इस पर कार्नी ने ट्रम्प को जवाब देते हुए कहा कि जैसे रियल एस्टेट में कुछ जगहें कभी बिक्री के लिए नहीं होतीं, वैसे ही कनाडा भी कभी बिकाऊ नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस इमारत में वे बैठे हैं या बकिंघम पैलेस जैसी जगहें कभी नहीं बेची जातीं, उसी तरह कनाडा भी न कभी बिकेगा और न कभी बेचा जाएगा। कार्नी ने यह भी कहा था कि कनाडावासियों की सोच इस मुद्दे पर नहीं बदलेगी और कनाडा कभी अमेरिका का हिस्सा नहीं बनेगा। ------------------------------ ये खबर भी पढ़ें… बांग्लादेश में टेक्सटाइल मालिकों की फैक्ट्रियां बंद करने की धमकी: कहा- भारतीय धागा उद्योग बर्बाद कर रहा, टैक्स छूट हटाने की मांग; 10 लाख नौकरियों पर खतरा बांग्लादेश की टेक्सटाइल इंडस्ट्री गंभीर संकट से गुजर रही है। टेक्सटाइल मिल मालिकों ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार जनवरी के अंत तक यार्न (धागे) के ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट को खत्म नहीं करती, तो 1 फरवरी से देशभर की मिलों में काम बंद कर दिया जाएगा। पूरी खबर पढ़ें…
https://www.bhaskar.com/international/news/canada-pm-trump-tariff-threat-no-china-trade-deal-137045405.html